बंगाल: कड़वाहट पर यहां की मिठास हमेशा भारी पड़ी है

राजनीति शायद भूल जाती है कि राजनीति संस्कृति को तैयार नहीं करती और आज की राजनीति में कोई संस्कृति या संभावना बची है क्या?

बंगाल: कड़वाहट पर यहां की मिठास हमेशा भारी पड़ी है
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यही सोचते और चलते हुए वर्धमान में सड़क किनारे एक मिठाई की दुकान पर ठहरता हूं. ठंड के मौसम में खजूर के गुड़ के बने रसगुल्ले दिल से दिमाग तक मिठास भर देते हैं. सोचता हूं बंगाल के ग्राउंड जीरो पर क्या है. खुद से खुद को जवाब मिलता है- स्वाद और मिठास.

सुर और स्वाद में मिठास की ज़मीन है बंगाल. चाहे वो गुरूदेव के गीत और कविताएं हों, हवा सा मुक्त बाउल गीत हो या फिर संथाली गीत-संगीत, सारे के सारे जीवन में मिठास घोलते हैं. इनके छंद-बंद में चाहे जितनी विभिन्नताएं हों पर इनके मूल में मानव प्रेम और मुक्ति की कामना है. मुक्ति- घृणा, नफरत और वैमनस्य से.

सती प्रथा के नाम पर आग में जबरन झोंक दी गयीं बाल विधवाओं की चीखों के खिलाफ राजा राममोहन राय खड़े ही नहीं हुए, तत्कालीन पाखंडी समाज के तीव्र विरोध के बावजूद कानून लाकर उसे बंद करवाया. विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को लेकर विद्यासागर की लड़ाई को कोई कैसे नज़रअंदाज कर सकता है जिसने स्त्री मुक्ति के लिए रुढ़ियों के बंद दरवाजों को ढहा दिया या फिर भक्ति आंदोलन के अग्रणी दूत चैतन्य महाप्रभु को, जिन्होंने सामंती समाज के साये में पल रही जातिप्रथा को नकार हर एक को गले लगाकर प्रेम करने की तहरीक़ चलायी.

कुल मिलाकर बंगाल की सरजमीं के मिज़ाज को अगर हम पढ़ने और समझने की कोशिश करें तो जो बात समझ में आती है वो ये कि कड़वाहट पर यहां की मिठास हमेशा भारी पड़ी है.

आज ये मेरा सच है. कल इस सच को आप भी मानेंगे जब बंगाल के मिठास के आगे हारेगी कड़वाहट की राजनीति.

(साभार-जनपथ)

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