हिंदी अखबारों के ‘समर्पण अभियान’ के बीच एक अदद कैप्‍टन जेफरसन की खोज

बीते पखवाड़े हुआ यूं कि हिंदी के अख़बारों ने जो कुछ लिखा और छापा, उसमें किसान आंदोलन को बदनाम करने की फौजी अनुशासन जैसी निरंतरता के अलावा बाकी सब कुछ धुप्‍पल में था.

हिंदी अखबारों के ‘समर्पण अभियान’ के बीच एक अदद कैप्‍टन जेफरसन की खोज
  • whatsapp
  • copy

कभी ऐसा होता है कि अख़बार इस दुनिया को समझने में मदद करते हैं. कभी यूं भी होता है कि अख़बार खुद ही समझ नहीं आते कि वे कहना क्‍या चाह रहे हैं. फिर कहीं और का रुख़ करना पड़ता है. मसलन, इस बार हम अखबारों के लीपे-पोते को एक नयी फिल्‍म के सहारे समझेंगे.

बीते पखवाड़े हुआ यूं कि हिंदी के अख़बारों ने जो कुछ लिखा और छापा, उसमें किसान आंदोलन को बदनाम करने की फौजी अनुशासन जैसी निरंतरता के अलावा बाकी सब कुछ धुप्‍पल में था. इस धुप्‍पल के केंद्र में था राष्‍ट्रपति के अभिभाषण पर प्रधानमंत्री का भाषण और उस भाषण में दी गयी एफडीआई की एक नयी परिभाषा ‘’फॉरेन डिस्‍ट्रक्टिव आइडियोलॉजी’’ या ‘’विदेशी विनाशकारी/विध्‍वंसक विचारधारा’’. बाकी सब कुछ वैसा ही था संपादकीय पन्‍नों पर, जैसे कि दिन- ब-दिन घटिया होता जाता जागरण के संपादक राजीव सचान का किसान आंदोलन को लेकर दुष्‍प्रचार.

इस पखवाड़े प्रधानमंत्री के नये ‘एफडीआई’ पर अखबार रपटे हुए थे. इसको हम सुविधा के लिए आगे से विविवि लिखेंगे, लेकिन इस पर आने से पहले एक फिल्‍म की चर्चा करना ज़रूरी है जो अख़बारों में फैले कुहासे को छांटने में मदद करेगी. ‘’न्‍यूज़ ऑफ द वर्ल्‍ड’’ नाम की यह फिल्‍म पिछले साल रिलीज़ हुई थी और बीते हफ्ते 10 फरवरी को नेटफ्लिक्‍स पर आयी. एक समय में पत्रकार रह चुके फिल्‍मकार पॉल ग्रीनग्रास द्वारा निर्देशित इस फिल्‍म में अपने ज़माने के दिग्‍गज सितारे टॉम हैंक्‍स पकी हुई दाढ़ी वाले बूढ़े कैप्‍टन जेफरसन किड बने हैं. कहानी अमेरिकी सिविल वॉर यानी 1860 के दशक के आसपास की है. कैप्‍टन किड गृहयुद्ध से जूझते देश में घूम-घूम कर दस सेंट के बदले अखबार पढ़कर लोगों को बाहर की खबरों से जोड़े रखने का काम स्‍वेच्‍छा से करते हैं.

इसी सिलसिले में वे एक ऐसे युद्धरत इलाके में पहुंचते हैं जहां के लड़ाके अपनी काउंटी में ‘’बाहरी’’ लोगों का सफ़ाया कर रहे होते हैं. इन लड़ाकों का नेता मेरिट फार्ले, कैप्‍टन से शाम को आम जुटान के बीच अपना अखबार ‘इरैथ जर्नल’ पढ़ने को कहता है. उस अख़बार में भैंसे पर चढ़े फार्ले की तस्‍वीरें और शौर्यगाथाएं होती हैं. उसे देखकर कैप्‍टन भरी सभा में एक वक्‍तव्‍य देता है-

"मिस्‍टर फार्ले ने मुझे पढ़ने के लिए अपना इरैथ जर्नल दिया है, जिसे देखकर लगता है मिस्‍टर फार्ले यहां सबसे ज्‍यादा काम करने वाले इंसान हैं. वे संपादक हैं, अखबार छापते हैं, कारोबारी हैं और जज भी हैं. और आप सब नेकदिल लोग उनके लिए दिन रात काम करते हैं. और मुझे ऐसा लगता है ये कोई खबर नहीं है. तो इसके बजाय मैं आप सब के लिए कुछ और बेहतर पढ़ के सुनाता हूं. इसे रख देते हैं."

कैप्‍टन इरैथ जर्नल के बजाय अपना लाया दूसरा अखबार ‘’हार्पर्स इलस्‍ट्रेटेड’’ पढ़ने लग जाता है. फार्ले उन्‍हें टोकता है. कैप्‍टन बताते हैं कि पेनसिल्‍वेनिया काउंटी की एक खदान के भीतर फंसे मजदूरों में से कुछ मजदूर कैसे जिंदा बच गए, यह उनकी साहसगाथा है. ऐसा कह के कैप्‍टन वोटिंग करवा लेते हैं कि कौन-कौन ऐसी प्रेरक गाथा सुनना चाहेगा. ज्‍यादातर लोग हाथ उठा देते हैं. अपनी गुलामी और थोपे गए श्रम के खिलाफ 10 मजदूरों के अदम्‍य साहस की कहानी वहां की जनता पर तुरंत असर करती है और वह अपने नेता फार्ले के खिलाफ बग़ावत पर उतर जाती है. कैप्‍टन की जान पर बन आती है. किसी तरह वह जान बचाकर निकल लेता है, लेकिन इस आपाधापी में नेता फार्ले मारा जाता है.

डेढ़ सौ साल बाद अपने यहां

मिस्‍टर फार्ले को खतरा केवल बाहरी लोगों से नहीं था, बाहरी लोगों से जुड़ी खबरों से भी था. बाहर की दुनिया में क्‍या हो रहा है, वह नहीं चाहता था कि उसके लोगों को पता चले. वह नहीं चाहता था कि किसी दूसरी काउंटी के गुलामों के साहसिक और बागी विचार उसके यहां पहुंचने पाएं, वरना उसके शासन को खतरा पैदा हो जाता. वहां अपने और दूसरे, घरेलू और बाहरी का फ़र्क एकदम साफ़ था. कोई लागलपेट नहीं. डेढ़ सौ साल बाद अपने यहां कबीले के मुखिया बस इसी काम में चूक गये- उन्‍होंने संसद में फॉरेन डिस्‍ट्रक्टिव आइडियोलॉजी (विविवि) का नाम तो लिया, लेकिन सा़फगोई नहीं बरती. नतीजा, अगले दिन और उसके बाद के दिनों में अखबारों ने रायता फैला दिया.

हिंदी अखबारों के कुछ स्‍थानीय संस्‍करणों और राष्‍ट्रीय संस्‍करणों को मिलाकर मैंने इस रायते को समेटा है. उसकी तस्‍वीर देखिए. आगे हम इन्‍हीं खबरों के सहारे बात करेंगे.

जिस दिन संसद में एफडीआई का अर्थ विविवि हुआ, उसकी अगली सुबह सेंसेक्‍स 51000 के कांटे को पार कर गया. नेशनल स्‍टॉक एक्‍सचेंज में फॉरेन पोर्टफोलियो इनवेस्‍टर्स की हिस्‍सेदारी 29 फीसदी बढ़ गयी. जागरण ने बिजनेस के पन्‍ने पर लिखा, ‘’वैश्विक रुझानों से तय होगी बाजार की चाल’’; राष्‍ट्रीय पन्‍ने पर लिखा, ‘’विश्‍व हमारी ओर देख रहा: मोदी’’; और हिंदुस्‍तान पटना ने लिखा, ‘’भारतीय संस्‍कृति कहती है पूरा विश्‍व अपना है: मोहन भागवत’’. दो दिन बाद योगी आदित्‍यनाथ ने निवेश के लिए स्विट्जरलैंड को यूपी का न्‍योता दे डाला और जयपुर केसरी ने इंद्रेश कुमार के हवाले से लिखा, ‘’देश में कट्टरपंथी लोगों की कोई जगह नहीं.‘’

अगर विदेशी विनाशकारी विचारधारा से इतनी समस्‍या है कि संसद में इस पर बोलना पड़ जा रहा है, तो योगी स्विट्जरलैंड को क्‍यों यूपी बुला रहे हैं और सेंसेक्‍स के अगली सुबह विदेशी पैसे से उछाल मारने पर अखबार क्‍यों अश अश कर रहा है? अगर विदेशी पैसा और निवेश ठीक है, तो विदेशी विचार गलत कैसे? जागरण ने संपादकीय में प्रधानमंत्री के वक्‍तव्‍य को सही ठहरा दिया लेकिन चेन्‍नई के एडिशन में उनका बयान छापा कि विश्‍व हमारी ओर देख रहा है. विश्‍व की आंख फोड़ देनी चाहिए फिर तो?

दो दिलचस्‍प उदाहरण लें. एक राजस्‍थान पत्रिका का है, जिसने सुबह राहुल गांधी के भाषण को रात में आये भूकम्‍प से जोड़ दिया और सब-हेड लगाया- ‘’किसान और मजदूर के आगे अंग्रेज़ नहीं टिक पाये, मोदी क्‍या चीज़?” क्‍या मोदी बाहरी हैं अंग्रेज़ों की तरह? सवाल तो बनता है, वरना अंग्रेज से उनकी तुलना क्‍यों की जाती? इस मामले में पंजाब केसरी ने लगता है ग्रीनरूम में विविवि का अर्थ पूछ लिया था, सो उसने सा़फ़-साफ़ ‘’अंतरराष्‍ट्रीय वामपंथी’’ लिख मारा हेडिंग में.

बात यहीं रुकती तो ठीक था. पखवाड़ा बीतते-बीतते सुदूर‍ त्रिपुरा से मुख्‍यमंत्री बिप्‍लब देब ने ऐलान कर दिया कि अमित शाह श्रीलंका और नेपाल में सरकार बनाने की योजना बनाये बैठे हैं. नेपाल के मामले में तो फिर भी यह बयान स्‍वीकारोक्ति की तरह दिखता है कि उसे वापस हिंदू राष्‍ट्र बनाने का खेल यहां से चल रहा होगा, लेकिन श्रीलंका में सिंहलियों और तमिलों के बीच सिर फोड़वाने कोई क्‍यों और क्‍या खाकर जाएगा?

‘विदेशी’ कौन है?

मोहन भागवत तो पूरी दुनिया को अपना मानते हैं, इसलिए उन्‍हें फिलहाल छोड़ दिया जाए. संसद में प्रधानमंत्री के दिये बयान का मतलब निकालना ज्‍यादा ज़रूरी है, जिसमें अख़बारों ने अगली सुबह खुद को फंसा पाया. क्‍या पंजाब केसरी को सही मानें, जिसने विविवि को वामपंथी समझा? या फिर राजस्‍थान पत्रिका को सही मानें, जिसने अंग्रेजों के साथ मोदी की तुलना कर दी? क्‍या आंख बंद कर के फेस वैल्‍यू पर लेते हुए मान लें कि यह बयान ग्रेटा थनबर्ग और रिहाना जैसे सेलिब्रिटी शख्सियतों के लिए दिया गया था? लेकिन ये तो उदार लोग हैं, कट्टरपंथी नहीं. फिर इंद्रेश कुमार किस कट्टरपंथी के लिए कह रहे हैं कि देश में जगह नहीं? और क्‍या स्विट्जरलैंड वालों से कोई गोतिया नाता है यूपी के लोगों का, जो योगीजी को उनसे परहेज नहीं?

चूंकि इस देश में विचारधारा की पहचान पार्टी से होती है, तो आइए पीछे चलते हैं. सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को एक रिटायर्ड अंग्रेज एओ ह्यूम ने तत्‍कालीन अंग्रेज वॉयसरॉय की मंजूरी से 1885 में खड़ा किया. इसका मूल नाम इंडियन नेशनल यूनियन था जिसकी सम्‍बद्धता अंग्रेज औपनिवेशिक शासन के साथ थी और जिसका काम भारतीयों के सरोकारों को स्‍वर देना था. मोटे तौर पर इसी पार्टी के झंडे तले आजादी की लड़ाई हुई और देश आजाद हुआ. इसके बाद 1925 में एक साथ कम्‍युनिस्‍ट पार्टी और राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (सांस्‍कृतिक संगठन, भारतीय जनसंघ और भाजपा की मातृ संस्‍था) की स्‍थापना होती है. कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की स्‍थापना की प्रक्रिया पांचेक साल तक चली. 1917 में रूसी क्रांति के बाद भारत से कुछ लोग रूस गये. ताशकंद और मेक्सिको में एमएन रॉय ने कम्‍युनिस्‍ट पार्टी खड़ी की, फिर धीरे-धीरे यहां भी अलग-अलग समूह अस्तित्‍व में आये. अंतत: कानपुर की पहली कांग्रेस में सीपीआइ अस्तित्‍व में आयी.

मने इतना तो तय है कि कांग्रेस और कम्‍युनिस्‍ट पार्टी दोनों के गठन में विदेशी हाथ और विचार रहे. कम्‍युनिस्‍ट तो वैसे भी खुद को अंतरराष्‍ट्रीयतावादी कहते हैं, कोई दुराव-छुपाव का खेल नहीं है. अब बच गया संघ, जिसने बाद में दो राजनीतिक दलों जनसंघ और भाजपा को पैदा किया. क्‍या संघ पूरी तरह स्‍वदेशी है?

संघ के संस्‍थापक केशव बलिराम हेडगेवार को उनके तिलकवादी गुरु मुंजे (सावरकर से पहले हिंदू महासभा के प्रमुख और आजीवन आरएसएस के संरक्षक) ने 1910 के आसपास मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्‍ता भेजा था. वहां वे कुछ क्रांतिकारियों के संपर्क में आये और अनुशीलन समिति के साथ जुड़ गये. अनुशीलन समिति और जुगान्‍तर समूह भारत के शुरुआती क्रांतिकारी राष्‍ट्रवादी कम्‍युनिस्‍ट समूहों में रहे हैं. जुगान्‍तर से कम्‍युनिस्‍ट नेता एमएन रॉय जुड़े थे. वहां से हेडगेवार लौटे तो कांग्रेस में आ गये. खिलाफ़त आंदोलन में गांधीजी से मोहभंग हुआ तो कांग्रेस से निकल कर आरएसएस बना लिए. आरएसएस बन तो गया था, लेकिन उसे शक्‍ल लेना बाकी थी. इसके लिए उनके गुरु बीएस मुंजे इटली चले गये और मुसोलिनी से मिलकर आये. इस कहानी के लिए अकसर मार्जिया कासोलारी के एक लेख का संदर्भ दिया जाता है (इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली, 22 जनवरी 2000) जो दिल्‍ली की तीनमूर्ति लाइब्रेरी के आरकाइव से उद्धृत है (मुंजे पेपर्स, बीएस मुंजे की डायरी के 13 पन्‍ने).

हेडगेवार के गुरु मुंजे पहले कांग्रेस में रहे, फिर 1920 में बाल गंगाधर तिलक की मौत के बाद हिंदू महासभा के साथ आये. वे 1931 में 15 मार्च से 24 मार्च तक दस दिन इटली रहे. वहां 19 मार्च को वे रोम के मिलिट्री कॉलेज, फासिस्‍ट एकेडमी ऑफ फिजिकल एजुकेशन, बलिल्‍ला और अवांगार्द नाम के दो संगठनों का दौरा किये जहां 6 से 18 साल की उम्र के लड़कों को सैन्‍य प्रशिक्षण दिया जाता था. डायरी में उन्‍होंने बाद में बलिल्‍ला के लिए विशेष सराहना लिखी. उसी दिन दोपहर तीन बजे फासिस्‍ट सरकार के मुख्‍यालय पलाज़ो वेनेजिया में वे मुसोलिनी से मिले. अगले दिन की डायरी में वे लिखते हैं कि मुसोलिनी उनके बारे में सब कुछ जानते थे. मुंजे ने मुसोलिनी को बताया कि उन्‍होंने अपना संगठन शुरू किया है (आरएसएस) और उन्‍हीं के समान उसका भी उद्देश्‍य है भारतीयों का सैन्‍य पुनर्गठन. वापस आकर बलिल्‍ला की तर्ज पर मुंजे ने नासिक में भोंसला मिलिट्री स्‍कूल स्‍थापित किया.

उनके वंशज यानी नरेंद्र मोदी की सरकार के बजट में इस साल बाकायदे 100 सैनिक स्‍कूल खोलने का ऐलान किया गया है. यह विचार 1931 में एक संगठन के मुखिया को इटली से आया था, उसकी धारा 2021 तक बहकर आ चुकी है और नरेंद्र मोदी की चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार का वैधानिक कार्यक्रम बन चुकी है. अब बताइए, मोदीजी का विविवि किसके लिए था?

जेल में दुष्‍कर्म के लिए बंद आसाराम के समर्थन में जंतर-मंतर पर भाषण देने वाले अवधेश कुमार जैसे पत्रकारों को इस बात का दुख है कि ग्रेटा थनबर्ग ने भाजपा को फासीवादी पार्टी कह दिया. वे 10 फरवरी के अमर उजाला में लिखते हैं ‘’ये तीनों लड़कियां न आर्थिक विशेषज्ञ हैं न कृषि विशेषज्ञ. इन्‍होंने तीनों कृषि कानूनों का ठीक प्रकार से अध्‍ययन किया होगा यह भी संभव नहीं.’’ अवधेश कुमार को इतनी मामूली सी बात नहीं समझ में आ रही है कि भाजपा को फासीवादी कहने के लिए कृषि कानून पढ़ने की जरूरत नहीं है किसी को, उसके लिए 1925 में शुरू हुए विचार की 2021 में बह रही धारा को देखना ही पर्याप्‍त है. प्रधानमंत्रीजी भी तो यही कह रहे हैं, कि विचारधारा देखो.

अब इसमें अखबारों और उनके टिप्‍पणीकारों की क्‍या गलती है कि वे समझ ही नहीं पाये ‘’विदेशी विचारधारा’’ का अर्थ? इसके दो ही कारण हो सकते हैं. अवधेश कुमार की तर्ज पर कहें तो संभव है अखबारों के संपादक और लेखक ‘’विचारधाराओं के विशेषज्ञ नहीं हैं’’ या फिर यह कि उन्‍होंने ‘’विचारधाराओं का ठीक प्रकार से अध्‍ययन किया होगा यह संभव नहीं है’’.

एक वजह और हो सकती है जिसका अंदाजा हमें ‘’न्‍यूज़ ऑफ द वर्ल्‍ड’’ से लगता है, जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया है. हो सकता है कि फिल्‍म के कबीलाई नेता फर्लो की तरह इन्‍हें भी अपने नेता सुप्रीम की ओर से वही पढ़ने को कहा गया हो जिसे वही लिखता है, वही छापता है. वह संपादक है, अखबार छापता है, कारोबारी है, जज भी. और ये सब नेकदिल लोग उनके लिए ही दिन रात काम करते हैं. वैसे भी, राष्‍ट्रीय सहारा में रोशन की बाइलाइन से छपी खबर तो मान ही रही है कि यह हिंदू जागरण का तीसरा चरण चल रहा है जिसका नाम है ‘’समर्पण अभियान’’ (देखें ऊपर दिया कोलाज).

इस समर्पण पर भरोसा न हो तो गूगल न्‍यूज़ पर कभी भी, किसी भी वक्‍त, हिंदी में ‘’राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ’’ सर्च कर के देख लीजिए. हिंदी के अखबार संघ प्रमुख मोहन भागवत के आगामी कार्यक्रमों और बैठकों की मुनादी करते मिल जाएंगे, जैसे मौसम का पूर्वानुमान बताया जाता है. बिहार का हिंदुस्‍तान और जागरण पिछले पखवाड़े इस मामले में प्रतिस्‍पर्धा में रहे हैं.

तर्ज ये कि हिंदी के ऐसे अखबारों और टिप्‍पणीकारों के बीच तो फिलहाल कोई कैप्‍टन जेफरसन किड नहीं है जो भरी सभा में कह दे कि मैं आपका अखबार नहीं पढ़ूंगा क्‍योंकि उसमें जो छपा है वो खबर नहीं है बल्कि असल खबर तो वो है जो टेलिग्राफ ने अपने मास्‍टहेड में छापा है, पर दुर्भाग्‍य कि वो अंग्रेजी में है. अब इतना तो हम जानते ही हैं कि 1939 में प्रकाशित अपनी किताब ‘’वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइंड’’ में गुरु गोलवलकर ने जो तीन विदेशी ‘म’ गिनाये थे, उनमें एक ‘मैकाले’ का आशय अंग्रेजी से था. लिहाजा अंग्रेजी विदेशी है, विनाशकारी है. इसलिए प्रधानमंत्री के एफडीआइ में फंसे पाठक नीचे के चित्र को ज्‍यादा गंभीरता से न लें.

Also Read : ‘न्यूजक्लिक’ के दफ्तर पर ईडी के छापे से नाराज पत्रकार संगठनों ने की कड़ी आलोचना
Also Read : ‘’आत्‍मनिर्भरता’’ के विविध रंग: किसान, पत्रकार, अखबार और आम इंसान
newslaundry logo

Pay to keep news free

Complaining about the media is easy and often justified. But hey, it’s the model that’s flawed.

You may also like