नांदे नेताम का दुर्भाग्य और बस्तर की कुछ उलझी हुई गुत्थियां

मृतका नांदे नेताम के परिजनों को न तो मेडिकल रिपोर्ट दी गई, न एफआईआर की प्रति और न ही पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट.

नांदे नेताम का दुर्भाग्य और बस्तर की कुछ उलझी हुई गुत्थियां
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छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में बसने वाले गोंड आदिवासियों की परंपरा के अनुसार जब भी किसी की मौत अकाल या अप्राकृतिक वजहों से हो जाती है, तो उसकी याद में बनाये गए स्मारक पर उस व्यक्ति की मृत्यु के कारणों का चित्रण किया जाता है. इसी परंपरा के मुताबिक दंतेवाड़ा जिले के समेली गांव के पाण्डुपारा इलाके के रहने वाले पाले नेताम भी बीमुल्क त्यौहार में अपनी बेटी का स्मारक बनाने की तैयारी में हैं. बीमुल्क गोंड आदिवासियों का त्यौहार है जिसे फरवरी या मार्च के महीने में अपने दिवंगतों की याद में मनाया जाता है. इससे जुड़ी एक और परंपरा है कि इस त्यौहार के 2-3 दिन बाद महुए के फूलों को बीनने का काम शुरू किया जाता है.

42 वर्षीय पाले नेताम कहते हैं, “मठ (स्मारक) बनेगा तो उस पर सड़क, नहर, सीआरपीएफ के जवानों के अलावा लड़की जिस हालत में मिली थी उसका चित्र भी बनाया जाएगा, क्योंकि हमे भले ही न्याय मिले या ना मिले, लेकिन मठ पर बने यह चित्र इस बात के हमेशा गवाह रहेंगे कि हमारी बेटी के साथ क्या हुआ था.”

नेताम की 16 वर्षीय बेटी नांदे नेताम ने 29-30 दिसंबर, 2018 की मध्यरात्रि को अपने घर के आंगन में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. परिजनों का आरोप है कि सितंबर के महीने में नांदे के साथ बलात्कार हुआ था जिसकी वजह से उसने आत्महत्या की.

मृतका नांदे के चाचा जयंत नेताम उसके साथ हुई घटना के बारे में न्यूज़लॉन्ड्री को विस्तार से बताते हुए कहते हैं, “14 सितंबर की बात है. मैं, मेरे बड़े भाई (पाले) और नांदे खेत में जुताई का काम कर रहे थे. जुताई करने के बाद मेरे भाई ने उसे खाना बनाने के लिए घर भेज था और कहा था कि खाना बनाने के बाद गायों को चराने के लिए ले जाना. नांदे घर चल गई. खाना बनाने के बाद वह फिर से कुरुमनाला जहां हमारा खेत है, लौट रही थी. मेरी रास्ते में उससे मुलाकात भी हुई. मैंने उससे पूछा था कि गाय चराने क्यों नहीं गई, तो उसने कहा कि वह गाय चराने बाद में जाएगी अभी फिर से खेत पर जा रही है. उसके बाद वो हमें दो दिन के बाद बेहोशी की हालत में नहर किनारे पड़ी हुई मिली.”

जयंत बताते हैं जब उनसे मिलने के अगले एक-डेढ़ घण्टे तक नांदे घर वापस नहीं लौटी तो हम सब उसे खोजने निकल गए, लेकिन उसका अगले दो दिन तक कोई सुराग नही मिला. वह बताते हैं, “हमारे परिवार के सभी लोग और गांव के तमाम लोग भी नांदे को ढूंढ़ रहे थे. हम लोग आस-पास के गांव में भी गए लेकिन कहीं कुछ पता नही चला.”

नांदे के पिता पाले कहते हैं, “खेत से जाने के बाद नांदे घर गयी थी. मैं बाजार चला गया था, लेकिन जब लौटा तो सबने बताया नांदे गुम हो गयी है. दो दिन बाद वह मिली तो उसको देख कर दिल दहल गया था.”

पाले और जयंत के मुताबिक वो दोनों नांदे को खोजते हुए नज़दीक ही स्थित पालनार के सीआरपीएफ के कैम्प भी गए थे. उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया तो वह कैम्प के बाहर तैनात सिपाही को नांदे की गुमशुदगी के बारे में बता आये और साथ में उसके आधार कार्ड की जानकारी भी दे आये ताकि उसे ढूंढ़ने में मदद हो सके.

जयंत कहते हैं, “जब रविवार को हम फिर से उसकी तलाश में निकले तो खेत के बगल से गुजरने वाली एक नहर के पास नांदे बेहोशी की हालत में पड़ी हुई मिली.”

परिवार वालों के मुताबिक पहले उसे कुआकोंडा के एक अस्पताल ले जाया गया लेकिन जब उसकी बेहोशी नही टूटी तो फिर उसे दंतेवाड़ा के एक अस्पताल में ले जाकर भर्ती कराया गया.

पाले बताते हैं, “दिन भर बच्ची बेहोश थी. रात के वक़्त उसकी आंख खुली. उसी दौरान हम लोग कुआकोंडा पुलिस थाने भी गए. थाने में लोगों ने बताया कि सीआरपीएफ वालों ने उन्हें इस हादसे के बारे में कोई जानकारी नही दी थी.”

परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने नांदे का पहला बयान नीम बेहोशी की हालत में ही ले लिया, वह भी बिना डॉक्टरी प्रमाण पत्र के जो कि यह साबित करता है कि व्यक्ति बयान देने की हालत में है कि नही.

जयंत कहते हैं, “जैसे ही नांदे की आंख खुली पुलिस उससे सवाल जवाब करने लगी थी. वह तब भी आधी बेहोशी में थी. जब पुलिस ने उससे पूछा कि उसके साथ क्या हुआ तो नांदे ने पुलिस को बताया कि दो लोगों ने उसे बिजली का झटका दिया. लेकिन अगले दिन जब नांदे की मां ने उससे पूछा कि उसके साथ क्या हुआ, तो उसने बताया कि उसके साथ बलात्कार हुआ है.”

नांदे की मां हुंगा नेताम ने न्यूज़लॉन्ड्री को बताया, “मैंने सुबह अपनी बेटी से पूछा कि उसने पुलिस को क्या बताया, कुछ याद है, तो मेरी बेटी ने बताया कि उसे कुछ भी याद नही. फिर जब मैंने उससे पूछा कि उसके साथ क्या हुआ था तो उसने बताया कि जब वह खेत के पास लकड़ी काट रही थी तो दो सीआरपीएफ के जवानों ने उसे पकड़ लिया. उनमे से एक बहुत लंबा था और दूसरा कद में छोटा था. जवानों ने नांदे से पूछा कि नक्सली हमारे घर पर आते हैं या नहीं? तो जवाब में उसने कहा कि नहीं आते.”

हुंगा बताती हैं कि सवाल-जवाब करने के बाद उन्होंने नांदे का मुंह एक तौलिये से ढंक दिया था. उसी वक़्त वहां बारिश शुरू हो गयी. बारिश खत्म होने तक वे वहीं रुके रहे और उसके बाद नहर पार करके उसे अपने साथ ले गए और फिर उसके साथ बारी-बारी से बलात्कार किया.”

जयंत बताते है पुलिसवालों ने उनसे कहा था कि नांदे की मेडिकल जांच में उनके साथ बलात्कार होने की कोई बात सामने नही आयी है. जब न्यूज़लॉन्ड्री ने उनसे मेडिकल जांच रिपोर्ट दिखाने की लिए कहा तो पता चला कि उन्हें मेडिकल रिपोर्ट ना ही दिखाई गई है और न ही दी गयी है.

नांदे के परिवारवालों के अनुसार 16 सितंबर, 2018 को कुआकोंडा पुलिस थाने में उन्होंने लिखित शिकायत दी थी. जिसके आधार पर अरनपुर थाने (घटना स्थल अरनपुर थाने की सीमा में है) प्राथमिकी दर्ज की गई थी. हालांकि प्राथमिकी की नकल पुलिस ने परिजनों को नही दी.

जयंत कहते हैं, हमने कुआकोंडा थाने में बलात्कार की शिकायत दी थी लेकिन आगे कोई कार्रवाई हुई नही. अरनपुर में प्राथमिकी दर्ज हुई लेकिन हमें प्राथमिकी की भी नकल पुलिस ने नही दी.

तकरीबन एक हफ्ते अस्पताल में रहने के बाद नांदे फिर अपने घर लौट आयी थी लेकिन उसके बाद वह हताश, गुमसुम रहने लगी थी.

इस घटना के बाद आदिवासी समाज की पालनार और बोडेपारा गांव में दो बैठकें भी हुई थीं जिसमें से एक बैठक में नांदे ने समाज के लोगों के सामने भी अपनी आप बीती भी सुनाई थी.

नांदे की मां हुंगा कहती हैं, “जब मैं उससे बाहर पानी भरने भेजती थी तो वह अकेले बाहर जाने से हिचकती थी. वह कहती थी लोग हंसते हैं उसके ऊपर. लेकिन हमें पता नही था कि वह इतनी परेशान है कि अपनी जान दे देगी. उसकी सहेलियों ने बाद में बताया कि वह उनसे कहती थी कि सिपाहियों ने उसकी जिंदगी तबाह कर दी है, उसकी बहुत बदनामी हो गयी है.”

नांदे की मौत

नांदे के परिवार के अनुसार पुलिस ने उन्हें बताया कि नांदे की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से यह पता चला है कि आत्महत्या करने से पहले उसने शराब पी थी और किसी के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया था.

नांदे के परिवार वाले बताते है उस दिन उसने चावल का लंदा (चावल से बनाया हुआ पेय जो नशे और पेट भरने के लिए पीया जाता है) पीया था लेकिन शारीरक संबंध वाली बात को वो सिरे से खारिज करते हैं.

पाले कहते है, “जब हमारी बच्ची ने बोला था कि उसके साथ बलात्कार हुआ है तब पुलिस ने कहा था मेडिकल जांच में कुछ नही आया है. लेकिन जब उसने आत्महत्या की तब पुलिस कह रही है कि उसने शराब पी थी और किसी के साथ शारीरिक संबंध बनाए थे. बहुत अजीब बात है.”

पुलिस की गड़बड़ी

गौरतलब है कि नांदे के परिवार को ना ही तथाकथित बलात्कार के बाद की मेडिकल रिपोर्ट दिखाई गई और ना है आत्महत्या के बाद की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट दी गई.

गांव के लोगों के अनुसार नांदे के बलात्कार की पुलिस थाने में शिकायत करने के बाद सीआरपीएफ ने बोडेपारा में पाण्डुपारा, समेली, एंडेपारा और अगल बगल के इलाके के लोगों को ज़बरदस्ती इरट्ठा करवाया था और धमकाया भी था. उन्होंने उस बैठक में कहा था कि लड़की के परिवारवालों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर सीआरपीएफ को बदनाम करने की बात कही थी.

न्यूज़लॉन्ड्री के पास मौजूद इस हिंदी और गोंडी ऑडियो में सीआरपीएफ के अधिकारी और अरनपुर पुलिस थाने के थाना इंचार्ज सोम सिंह सोढ़ी गांव वालों से कह रहे हैं, “तुम्हारा इस्तेमाल मनावधिकार कार्यकर्ता राजनैतिक फायदे के लिए करते हैं. तुम लोग फ़ोर्स के लोगों को कभी भी बदनाम मत करना. उनको बिना सोचे समझे कभी भी बदनाम मत करना.”

ऑडियो में सीआरपीएफ के अधिकारी कह रहे हैं, “बच्ची के परिवारवाले उसके बातें कहलवा रहे हैं, लड़की की मां उससे पुलिस का नाम लेने के लिए बोल रही है और हमारे पास उसकी रिकॉर्डिंग भी है. उससे कहा गया था कि बोलना दो लोग वर्दी में आये थे, तुझे पकड़ लिया था और फिर तू बेहोश हो गयी थी. वह बच्ची कह रही थी कि मां तू भी तो जानती है कि क्या हुआ था, तेरे सामने ही तो किए थे. मुझे करंट लगाया था.”

सीआरपीएफ अधिकारी गांव वालों से यह भी कह रहे कि गांव के लोग ही इसमें शामिल हैं और एक एक आदमी के ऊपर कार्रवाई होगी.

न्यूज़लॉन्ड्री के पास मौजूद ऑडियो में सीआरपीएफ और पुलिस के अधिकारी साफ साफ यह बोलते सुनाई दे रहे हैं कि लड़की की मां, बाप और चाचा ने उससे पुलिस का नाम लेने कहा है. वह गांव वालों को गोंडी में एक रिकॉडिंग भी सुना रहे हैं.

नांदे की मां हुंगा नेताम और उनके परिवार के कहे अनुसार यह रिकॉडिंग खुद पुलिस ने बनाई है पुलिस के ही लोगों की आवाज़ में और फिर बैठक में अन्य गांव वालों को सुनाई है.
हिड़मे नेताम एक स्थानीय महिला बताती हैं कि बैठक का मकसद था गांव वालों को चेतावनी देना कि सीआरपीएफ का नाम कहीं भी बदनाम नही होना चाहिए. गांव वालों ने बताया कि सीआरपीएफ द्वारा बुलाई गयी बैठक के बाद सितंबर के आखिरी हफ्ते में बोडेपारा में आदिवासी समाज की बैठक बुलाई गयी थी जिसमे नांदे ने सभी के सामने बोला था कि उसके साथ सीआरपीएफ के दो जवानों ने बलात्कार किया था.

न्यूज़लॉन्ड्री ने जब उप पुलिस अधीक्षक दिनेश्वरी नंद जिन्होंने नांदे नेताम का बयान दर्ज किया था, से इस मामले के बारे में पूछा तो वह कहती हैं, “डॉक्टरों की टीम ने उसकी मेडिकल जांच की थी और उसके अनुसार उसके साथ बलात्कार नही हुआ था. वह लगभग दो दिन तक बेहोश थी और इत्तेफ़ाक़ से जब उसे होश आया था, तब मैं वहीं मौजूद थीं. जब उसने बोलना शुरू किया तो मैंने ऐसे ही पूछा कि क्या ही गया था. उसने बताया था कि कुछ ग्रामीण लोग आए थे वहां जिन्होंने उसे करंट लगा दिया था. असल में यहां पर जंगली सुअर के शिकार के लिए करंट का इस्तेमाल किया जाता है, तो उसने बताया था कि उन ग्रामीणों ने उससे पूछा कि वह वहां क्या कर रही है, और उसको करंट का झटका दे दिया था.”

नंद ने बताया कि उस दिन उन्होंने नांदे का बयान लिखा था. वह कहती हैं, वह दो दिन से बेहोश थी. मैंने बस उससे उस वक़्त बातचीत की थी. डॉक्टर भी उस वक़्त बयान लेने से मना कर रहे थे. उससे बात करने के बाद आला अधिकारियों को सूचित कर दिया था. उन्होंने भी बोला कि लड़की को आराम करने दो सुबह बयान लेंगे. लेकिन रात को उसके मां-बाप उसके साथ थे तो सुबह तक कहानी बदल गयी, और बयान अलग हो गया. जिसमे उसने बताया कि सीआरपीएफ के जवानों ने उसके साथ बलात्कार किया था.

नंद आगे कहती हैं, “लेकिन बयान बदलने के लिए उसे उसके परिवार वालों ने बोला था जिसकी रिकॉडिंग बाद में पुलिस ने स्थानीय मीडिया को भी दे थी. उसके बाद इस मामले के बारे में मैंने अखबार में पढ़ा, जब उस बच्ची ने आत्महत्या कर ली. अखबार में लिखा था घर वालों और मानवधिकार कार्यकर्ताओं के दबाव में उसने आत्महत्या कर ली.”

नंद से जब पूछा गया कि मेडिकल जांच की रिपोर्ट उनके परिवार के सदस्यों को क्यों नहीं दी गई, तो वह कहती हैं, “उन्हें बता दिया गया था कि जांच में ऐसा कुछ नही आया है और मेडिकल रिपोर्ट परिवार वालों को नही दी जाती.”

लिंगाराम कोडोपी जो कि मूल रूप से समेली गांव के ही रहने वाले हैं और दंतेवाड़ा में मनावधिकार कार्यकर्ता के रूप में कार्य करते हैं, कहते है, “जिस दिन वह बच्ची गायब हुई थी वह दिन शुक्रवार का था और सभी गांव के लोगों ने वहां सीआरपीएफ वालों को देखा था और यह सब जानते है कि वह अक्सर कुरुमनाले के पास घूमते रहते हैं. अगले दिन शनिवार को कुरुमनाले के पास चार मोटरसाईकल आयी थी. गांव वालों को लग रहा है कि शुक्रवार को उसको वहां से ले गए और शनिवार को उसको वहां फेंक कर चले गए. उसने पहले बयान में जो बिजली का जिक्र किया था उसका कारण यह भी हो सकता है कि उसे बिजली घर ले गए हो क्योंकि बिजली घर महज़ वहां से डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर है.”

हालांकि लिंगा जो कह रहे हैं वह सिर्फ उनका अपना आकलन है और इसे साबित करने के लिए लड़की अब इस दुनिया में नहीं है.

न्यूज़लॉन्ड्री ने दांतवाड़ा के डीआईजी, सीआरपीएफ, डीएन लाल से नांदे के बलात्कार से जुड़े आरोपों के बारे में पूछा तो वह कहते हैं, “इस मामले की जांच करने का काम पुलिस का है ना कि सीआरपीएफ का. पहली बात तो उस लड़की के साथ बलात्कार हुआ ही नहीं क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट में कहीं इसका जिक्र नहीं है. डॉक्टरों की एक टीम उसकी जांच कर रही थी जिसके अनुसार बलात्कार नही हुआ था और ना ही लड़की के पोस्टमॉर्टम में ऐसी कोई बात सामने आई है.”

न्यूज़लॉन्ड्री ने इससे मामले में अरनपुर थाने के प्रभारी सोम सिंह सोढ़ी से बात की तो वह कहते है, “छानबीन चल रही है हमारी. अभी कुछ पता नही चला है.”

गौरतलब न्यूज़लॉन्ड्री के पास मौजूद ऑडियो में अरनपुर थाना प्रभारी सोढ़ी ही गांव वालों से कह रहे है कि सीआरपीएफ का नाम बदनाम ना करें और वह भी प्राथमिकी दर्ज होने के एक दिन बाद.

जब उनसे यह पूछा गया कि पुलिस ने नांदे नेताम के परिवार वालों को प्राथमिकी क्यों नही दी, तो उनके पास कोई वाजिब जवाब नही था. वह कहते हैं, “अगर प्राथमिकी नही दी हैं, तो लड़की के परिजनों को हमारे पास भेज दीजिये हम दे देंगे. जब उनसे आगे पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बारे में पूछा गया तो पहले तो उन्होंने कहा कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट अभी आयी नहीं है लेकिन हाँ लड़की की मौत हैंगिंग से ही हुई थी और उसने शराब भी पी थी.”

न्यूज़लॉन्ड्री ने अरनपुर थाने के प्रभारी सोढ़ी से इस मामले से जुड़े दस्तावेजों (एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट) साझा करने की बात कही तो उन्होंने साफ इंकार कर दिया.

गौरतलब है कि एक तरफ सीआरपीएफ के डीआईजी, डीएन लाल पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आ जाने की बात कह रहे हैं वहीं अरनपुर के थाना प्रभारी कहते हैं कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट अभी आयी ही नही है.

मृतका नांदे नेताम के परिजनों को उसकी मत्यु से संबंधित पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, एफआईआर या फिर शुरुआती मेडिकल रिपोर्ट की नकल न देना पुलिस की कार्यप्रणाली के ऊपर संदेह पैदा करता है. उल्टे पुलिस यह दावा जरूर कर रही है कि मृतका ने शराब पी रखी थी और उसने आत्महत्या से पहले शारीरिक संबंध बनाए थे.

बस्तर में रहने वाली मानवाधिकार वकील और कार्यकर्ता बेला भाटिया जो की एक वकील के रूप में नेताम परिवार के साथ अस्पताल में थीं, कहती हैं, “किसी भी व्यक्ति का बयान तब लिया जाता है जब डॉक्टर बयान लेने का प्रमाणपत्र दे, यह कह दे कि व्यक्ति बयान देने लायक है. इस मामले में दो दिन से वो लड़की बेहोश थी, जैसे ही उसकी आंख खुली पुलिस उसका बयान लेने लगी. उस वक़्त ऐसी हालत में लिए हुए बयान को महत्व देना ठीक नहीं है, क्योंकि वह उस वक़्त पूरी तरह से होश में नहीं थी. अगले दिन जब उन्होंने लड़की का बयान लिया तो उसने उन्हें उसके साथ हुए बलात्कार की बात बताई और उसी बयान को दर्ज किया. लेकिन पिछले दिन आधी बेहोशी में जो उस बच्ची ने बातचीत की थी उसको किसी पुलिसवाले ने फोन पर रिकॉर्ड कर लिया था. लेकिन कायदे के अनुसार आधे होश में की गई बातचीत को बयान नही माना जा सकता.”

भाटिया आगे कहती हैं, “अभी तक कोर्ट में इस मुकदमे को दायर नही किया गया है. लेकिन आगे की कार्यवाही परिवार के लोगों के साथ बात करके तय की जाएगी.”

स्थानीय पत्रकार प्रभात सिंह कहते हैं, “आदिवासियों के पास संसाधन ही नहीं हैं कि वो अपने खिलाफ हो रही ज़्यादतियों से लड़ सकें. वह तो यह मानवधिकार कार्यकर्ता यहां मौजूद है जो इनके खिलाफ हो रहे अत्याचारों से लड़ने के लिए इनका साथ देते हैं, वरना इनका शोषण और बढ़ जाएगा.”

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