पार्ट-1: मुझे ‘गैंग्स ऑफ   वासेपुर’ भी करनी थी साथ में ‘बजरंगी भाईजान’ करनी थी
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पार्ट-1: मुझे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ भी करनी थी साथ में ‘बजरंगी भाईजान’ करनी थी

दिल बेचारा के जरिए पहली बार निर्देशन की दुनिया में क़दम रख रहे मुकेश छाबड़ा का विस्तृत इंटरव्यू.

By अजय ब्रह्मात्मज

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कास्टिंग डायरेक्टर से डायरेक्टर बने मुकेश छाबरा का सफ़र रोचक और प्रेरक है. दिल्ली में लम्बा संघर्ष रहा, लेकिन राह भी बनती गयी. धीरे-धीरे अपनी एकाग्रता से मुकेश छाबरा ने कास्टिंग को प्रतिष्ठा दिलवाई. निर्देशन की ख्वाहिश पहले से थी. वह ‘दिल बेचारा’ से पूरी हुई है.

हम आपके कास्टिंग के अनुभव को लेकर बात करेंगे. इसमें आपके जो अनुभव रहे हैं, जिसमें आपके बीते समय के बारे में और किसी कास्टिंग को लेकर कोई किस्सा याद आता हो तो वह भी सुना दें. जिससे आपके प्रोफेशन की रोचक जानकारियां मिलती हो? पहले लोग सोचते थे कि कास्टिंग डायरेक्टर क्या बात करेगा. उसका काम अलग है. हम लोग एक्टर और डायरेक्टर से बात करते हैं. थोड़ा बहुत निर्माता और लेखक से बात कर लेते हैं. हमारी यह कोशिश है कि आपके विजन को लोगों तक कैसे पहुंचाएं.

जी... उनकी भी रूचि जागेंगी.

हो सकता है कि दस साल बाद दूसरा मुकेश छाबरा निकल कर आ जाएं?

सर, मैं चाहता हूं कि ऐसा हो. हमने इस क्षेत्र को पहचान दी है. मैं चाहता हूं कि और लोग आएं. जिस तरह लोग एडिटिंग और डायरेक्शन में जा रहे हैं. मेरी तमन्ना है कि लोग कास्टिंग में भी जाएं. कास्टिंग को लेकर अच्छा सा ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट खोला जाए. लोग आवेदन करें. उन्हें कास्टिंग डायरेक्टर बनने की ट्रेनिंग मिले. उन्हें पता चले कि कैसे कास्टिंग करनी चाहिए. किन बातों की जानकारी होनी चाहिए. कास्टिंग डायरेक्टर का विज़न क्या होता है? आप डायरेक्टर से बात करते हैं. आपको गालियां सुननी पड़ती हैं. आपको कमरे से बाहर निकाल दिया जाता है. पर आप अपने फैसले पर टिके रहते हैं. इस प्रोसेस से हर आदमी को गुजरना चाहिए. मुझे लगता है कि यह सबको करना चाहिए. इस क्षेत्र के बारे में छह साल पहले किसी को जानकारी नहीं थी. किसी को नहीं पता था कि यह क्षेत्र इज्जत और पहचान देता है. उसमें लग लग के हमने पहचान दी है. मैं चाहता हूं कि यह पहचान जिंदगी भर रहें.

कहीं ना कहीं किसी ना किसी को शुरुआत करनी थी. अच्छा लगता है कि हम उस आगाज का हिस्सा हैं. मुझे यह सोच कर खुशी होती है. मुझे याद है कि कास्टिंग के दौरान मेरी कई सारी लड़ाइयां हुई हैं. सबसे ज्यादा लड़ाई मेरी अनुराग कश्यप से पंकज त्रिपाठी के रोल को लेकर हुई थी. जिस रोल को वह चाह रहे थे, उस रोल में मैं पंकजजी को चाह रहा था. मैं उनके लड़ पड़ा था. यह मुझे हमेशा याद रहेगा. अनुराग के साथ मेरी यह पहली फिल्म थी. उस लड़ाई की वजह से ही मेरी और अनुराग की दोस्ती और गहरी हुई है. उनको समझ मे आया कि मुकेश कहीं भी लड़ पड़ता है. वह भी सही चीज के लिए. वह सुल्तान के रोल के लिए किसी और एक्टर को चाह रहे थे. मैं पंकज त्रिपाठी को लेना चाह रहा था. वह जानते नहीं थे कि पंकज त्रिपाठी क्या थे. मैंने पंकज के साथ एनएसडी में उसका काम देखा था. मुझे लगा कि सुल्तान के किरदार के लिए वो सही हैं.

चिल्लर पार्टी में उन्होंने छोटा सा रोल किया था. तभी मुझे लग गया था कि वह अच्छे एक्टर हैं. वह बड़े रोल के योग्य हैं. मैंने सुल्तान के रोल के लिए अनुराग के बात की. हमारी बात यहां तय हुई कि दोनों ही एक्टर के साथ बराबर के सीन किए जायेंगे. मैं दोनों एक्टर के साथ पांच सीन करूंगा. अनुराग को कहा कि आपको दोनों के सीन दिखा दूंगा. उन्होंने दोनों सीन देखें. मुझे फिर अनुराग का फोन आया. उन्होंने कहा कि मुकेश आप सही हो. हम पंकज को कास्ट करेंगे. मेरा कहना यही है कि हमें अपने विजन पर टिके रहना चाहिए.

कास्ट करना सबसे टफ काम होता है. क्या होता है कि आपकी खुद पहचान नहीं होती है. उनको लगता है कि आप काबिल नहीं हो. डायरेक्टर के साथ लड़ कैसे सकते हो. डायरेक्टर को भी अपने विजन पर भरोसा होता है. हमें उनके विजन को पूरा करना होता है. जब हम उनके विजन के बारे में बात करते हैं तो वह हम पर भी भरोसा नहीं करते हैं. वही एक फाइट है. मैं समझाने की कोशिश करता हूं. मेरे ख्याल से अब सारे डायरेक्टर समझ ही गए हैं. उनके विजन को मैं पूरा करने में मदद करता हूं. यह करने में बहुत मजा आता है. अच्छा लगता है.

फिल्मों के साथ अपने बैंकग्राउंड के बारे में भी बताएं. वैसे आप थोड़ा बहुत पहले बता चुके हैं. लेकिन फिल्मों से जुड़ने की बात कैसे हुई. फिल्मों से जुड़ी शुरुआत की यादें क्या हैं आपकी

मैं दिल्ली रंगमंच थिएटर से जुड़ा हुआ था. मैं 1992 और 1993 से बच्चों के गर्मियों की वर्कशॉप करता था. मैं खुद वर्कशॅाप में हिस्सा लिया करता था. फिल्मों से नाता तो रहा है. हम सब सलमान खान, शाहरूख खान और गोविंदा को देख कर बड़े हुए हैं. फिल्मों का नाता घर से ही था. क्योंकि उस समय हमें लगता था कि यह तो हमारे जैसे ही हैं. उनकी फिल्मों और उनकी स्टाइल को देखना. हम वैसे ही बड़े हुए हैं. हॅालीवुड की तरफ हमारा रूझान नहीं था. यहां पर आकर मुझे पता लगा कि लोग ईस्ट और वेस्ट की बात करते हैं.

मेरे लिए जिंदगी गोविंदा, संजय दत्त और सलमान खान ही रहे हैं. खैर, थिएटर में जाने पर चीजों को मैंने समझना शुरू किया. फिल्मों से जुड़ने का एहसास तब हुआ जब मैंने विशाल भरद्वाज सर को ‘ब्लू अम्ब्रेला’ में मदद की थी. मैंने हनी के साथ इस फिल्म के लिए बच्चों की कास्टिंग दिल्ली में की थी. उसके बाद मेरा फिल्मों से नाता जुड़ गया. वहां से ‘लव आज कल’. थिएटर के लोगों को मैं अच्छे से समझता था. दिल्ली में जितने लोग छोटी-छोटी फिल्में बनाने आते थे, मैं उन्हें एक दो सीन के लिए बच्चे या अन्य किरदारों के सुझाव दे देता था. इतना तो तभी शुरू हो गया था.

यानि बतौर कास्टिंग डाइरेक्टर पहली फिल्म आपकी ब्लू अम्ब्रेला है?

जी... एक तरीके से. मैंने जब पहली बार विशालजी के साथ इंटरैक्शन किया था, उससे पहले विशाल सर एक ‘बर्फ’ नाम की फिल्म बना रहे थे.

जी, मनोज वाजपेयी को लेकर बना रहे थे?

हां. उस फिल्म के लिए उन्हें चार लड़के बतौर एक्टर चाहिए थे. उस फिल्म के समय जब उनकी ‘माचिस’ आयी थी. तब मुझे पियुष मिश्रा ने कहा था कि अबे तुम बहुत अच्छी एक्टिंग करते हो. तुम मेरे साथ आओ. तुम्हें किसी से मिलवाना है. हमें ले जाकर उन्होंने विशालजी के सामने बैठा दिया. मैंने कहा कि हमें एक्टिंग नहीं करनी है. उस फिल्म में विशाल ने हमें ही कास्ट कर लिया था. वह फिल्म तो नहीं बनी. पर मेरे विशाल से रिश्ते बन गए थे. फिर वहीं से उनसे नाता जुड़ गया.

दूसरी आपने ‘अमल’ फिल्म बोली थी. वह किसकी है

रिची मेहता कनाडियन डायरेक्टर हैं. यह उनकी पहली फिल्म थी. मैं बच्चों के साथ काम करता था. उन्हें इस बारे में पता चला. हमारी मुलाकात हुई. मैंने इस फिल्म की कास्टिंग की. वहां से थोड़ी चीजें शुरू हुई. उसके बाद ‘लव आज कल’ हुआ. ‘रंग दे बसंती’ में मैं असिस्टेंट कास्टिंग डायरेक्टर था. कास्टिंग में थोड़ा मदद करता था. दिल्ली के सारे लोकल एक्टरों को जुटाने का काम मैंने ही किया. इस फिल्म में बहुत सारे एक्टर थे. कॅालेज सीन में एक-एक करके लोग ऑडिशन देने आते हैं. मैंने वहां सब किया. वहां से मैंने उनको ‘रंग दे बसंती’ में मदद की. मैं पूरी फिल्म के समय उनके साथ रहा. लोगों को खोजता रहा. वहां से मेरी दुकान चल पड़ी.

दिल्ली से मुंबई शिफ्ट करने का आपने कब सोचा?

रंग दे बंसती के बाद मैंने यह तय किया. 2007 में मैं मुंबई शिफ्ट हो चुका था. फिर ‘चक दे इंडिया’ के समय मुझे कास्टिंग के समय मैसेज मिला. अभिमन्यु कास्टिंग डायरेक्टर थे. उन्होंने कॅाल करके कास्टिंग के लिए बुलाया. उसके बाद मुझे प्रतीत हुआ कि खुद की एक दिशा तय करनी चाहिए. तब मैंने खुद की कास्टिंग एजेंसी खोली.

यह आपने कब सोचा और कब आप इंडिपेंडेंट हुए?

‘लव आज कल’ के समय ही मैं इंडिपेंडेंट हो चुका था. इम्तियाज अली हमें काफी समय से जानते थे. बाकी फिल्में भी मैंने इंडिपेंडेंट ही की थी. पर मुख्यधारा में आने के लिए कुछ करना जरूरी था. मैं मुंबई पहुंच गया. उसके बाद असली सफर शुरू हुआ.

मेजर ब्रेक आपको ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद मिला?

मुझे ‘चिल्लर पार्टी’ बड़ा ब्रेक लगता है. बाकी फिल्में भी कीं. पर उसके बाद लोग सामने से आते थे. विशाल सर ने ‘कमीने’ की कास्टिंग के लिए कहा. वो सब कर चुके थे. ‘चिल्लर पार्टी’ और ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बाद तहलका मच गया. मैं खुद मिडिल क्लास परिवार से हूं. मैं खुद गलियों में नाच चुका हूं. मैं एक बैकग्राउंड डांसर रहा हूं. लोगों को शायद यह बात नहीं पता. मेरे परिवार के पास उतनी सहूलियत नहीं थी. एक होटल में वैनेट और सावन नाम का ग्रुप था. मैं उनके साथ नाचा करता था. वहां से मैं थोड़ा सा पैसा कमाता था. मैंने इन पैसों से अपनी पढ़ाई पूरी की. मैं होटल में दिन में और शाम को बड़े गायकों के पीछे स्टेज पर डांस किया करता था.

वहां से मैंने शुरू किया. डांस के साथ थिएटर वर्कशॅाप भी करता था. कुल मिला जुलाकर काम किया करता था. इस तरह मैं क्रिएटिव फील्ड से जुड़ चुका था. वहां से मेरा सफर शुरू हुआ. कोर्स करने के बाद मैंने ग्रेजुएशन पूरा किया. फिर एनएसडी आया. नौकरी लग गई थी. मैंने वहां एक साल नौकरी की. उसी दौरान दिल्ली में थोड़ी बहुत कास्टिंग का काम किया करता था. मैंने नौकरी छोड़ दी. मुझे जॅाब बदलना था. इस वजह से मैं तीन महीने के लिए एनडीटीवी गया. तीन महीने काम करने के बाद लगा कि यह मेरे टाइप काम नहीं है.

आप वहां क्या काम करते थे?

एनडीटीवी में ‘गुस्ताखी माफ’ शो आता था. मैं उसमें पपेट चलाता था. आवाज़ देता था. कुछ समय बाद मुझे लगा कि यह मेरे बस का काम नहीं है. मैंने वहां गुस्से में काम छोड़ा और मुंबई आ गया.

जब कास्टिंग का सिलसिला शुरू हुआ तो आप क्या फिल्में देखते थे? मेरा सवाल यह है कि कास्टिंग के नजरिए से फिल्मों को देखना आपने कब शुरू किया?

‘बैंडिड क्वीन’ के बाद मुझे ऐसा लगने लगा था. मैं सोच में पड़ गया था कि कैसे-कैसे एक्टर इसमें कास्ट किए गए हैं. मुझे यह बहुत दिलचस्प लगा. उसके बाद ‘दिल से’. ‘दिल से’ के समय मेरे ही क्लास के दो बच्चे शाहरूख के छोटे भाई-बहन बने थे. इन सभी प्रोसेस का मैं हिस्सा था. मैं समझने लगा कि यह कुछ दिलचस्प चीज है. तिग्मांशु धुलिया को इसका क्रेडिट दूंगा. उन्होंने यह प्रोसेस हिंदुस्तान में सही तरीके से इस्तेमाल किया. उन्होंने ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘दिल से’ फिल्म में कास्ट किया था. वह कास्ट करते थे. ‘भंवर’ और बाकी कई बड़े शो में वह कास्ट करते थे. तभी से मेरा दिमाग चलना शुरू हो गया था.

पीछे पलट कर देखें. परफेक्ट कास्टिंग के हिसाब से आपको कौन सी हिंदी फिल्म बेस्ट लगती है?

जी, ‘मदर इंडिया’, ‘बूट पोलिश’ और ’दोस्ती’. ‘मदर इंडिया’ में यंग बच्चे कास्ट किए गए थे. सुनील दत्त का बचपन का किरदार जिस बच्चे ने निभाया था, वह यादगार है. तब कास्टिंग डायरेक्टर नहीं हुआ करते थे. पर किसी तरह तो इन बच्चों को खोजा गया होगा. मैं ‘मिस्टर’ इंडिया से बहुत प्रभावित हूं. उस फिल्म बच्चों की फौज थी. मैं क्राय कंपनी में था. इस वजह से बच्चों का काम जहां देखता, मेरा ध्यान अपने आप उनकी तरफ चला जाता था. बूट पॉलिश’ आपको याद हो तो उसमें भी दो बच्चे थे. मैं सोचता हूं कि इतने प्रतिभाशाली बच्चे कैसे खोजे जाते होंगे? ‘ब्लू अम्ब्रेला’ के बच्चे कास्ट करने के लिए मुझे बुलाया गया था. बहुत मजा आता था. यह सारी फिल्में मेरे जीवन में प्रमुख रहेंगी.

फिल्मों में आपको सबसे अधिक आकर्षक क्या लगता है. किस वजह से आप जुड़े और अभी भी उत्साह के साथ काम कर रहे हैं? आप प्रोफेशनल और निजी जिंदगी के नजरिए से बताइएगा?

एक कहानी को लोगों तक पहुंचाना, मुझे सबसे अधिक आकर्षित करता है. हम परदे पर कलाकारों को देखते हैं. उन्हें देखकर हम रोते हैं. खुश होते हैं. यह प्रोसेस मेरे लिए हमेशा दिलचस्प रहा है. हमें पता भी नहीं होता कि वह सच है या नहीं. हम फिल्म के साथ ट्रेवल करते हैं. मुझे टिपिकल हिंदी फिल्मों का नाच-गाना ड्रामा बड़ा पसंद आता था. फिल्मों के प्रति समझदारी बढ़ने पर मुझे कई जानकारी मिली. मुझे पता चला कि नाच-गाना के आलावा भी फिल्में होती हैं. फिल्में कहानी को जीवित कर देती हैं. यह मुझे अच्छा लगता था. कास्टिंग के तौर पर मेरा उद्देश्य नए कलाकारों से मिलना था.

मुझे उनसे इंटरेक्ट करने का अवसर डायरेक्टर से पहले मिलता था. मैं नए कलाकारों को डायरेक्टर से पहले डायरेक्ट करता हूं. डायरेक्टर बनने की दिशा में मेरे लिए इससे अच्छा प्रोसेस कोई और नहीं हो सकता है. नए एक्टर को चुनना. स्क्रिप्ट पढ़ना. ऑडिशन करना. नए एक्टरों से मिलना होता है. जब मैं किसी सुशांत सिंह राजपूत, राजकुमार यादव या ‘चिल्लर पार्टी’ के बच्चों को देखता हूं तो खुशी होती है. ऐसा लगता है कि इनके आगे बढ़ने में मेरा योगदान है.

जैसे बाप अपने बेटे को बढ़ता हुआ देखकर खुश होता है. मेरी भी खुशी वैसी ही होती है. यह एक अनुभव है. अपने बच्चों को परदे पर देखना सबसे अच्छी बात लगती है. यह लोग आगे चलकर मेरे साथ रहे या ना रहें. मैं केवल उन्हें खुश देखना चाहता हूं. मैंने कई एक्टरों को अपने आंखों के सामने बनते हुए देखा है. ऋचा चड्ढा उन्हीं में से हैं. मैंने श्रद्धा कपूर को बनते हुए देखा है. हुमा कुरैशी को बनते हुए देखा है. सुशांत और राजकुमार को बनते हुए देखा है. मैंने कई सारे लोगों को बनते हुए देखा है. अभी और एक्टर मेरी आंखों के सामने बनेंगे. यह एक प्रोसेस है. नीचे से लेकर ऊपर तक पहुंचने का प्रोसेस है. मैं अपने आंखों से इस प्रोसेस को पूरा होते हुए देखता हूं. इस वजह से मैं हर किसी को नहीं कहता कि आप बन सकते हो, क्योंकि यह मैंने अपने आंखों से देखा हुआ है. साथ ही मैंने उन्हें ट्रेंड किया. उनके साथ मैंने वर्कशॅाप किया. कई सारी चीजें की हैं.

तो आप इन सारे एक्टरों को लेकर कितने पजेसिव हैं? खासकर अपने क्रिएशन और चनाव को लेकर. कई बार यह तकलीफ भी देता होगा.

हां, थोड़ा बहुत. कई बार खुशी वाली तकलीफ भी होती है. हम सोचते हैं कि ठीक है यार. वह आगे बढ़ गया. मैं खुश हूं. कई बार ऐसा लगता है कि यार, यही तो मेरा काम है. इसकी वजह से मुझे नाम और पैसा मिल रहा है. कई बार मुझे मेरे मन को भी समझाना पड़ता है. जिस तरह लेखक का एक काम होता है. डायरेक्टर का एक काम होता है. वैसा मेरे साथ भी है. कास्टिंग करना मेरा काम है. पहले तो थोड़ा बुरा लगता था, पर अब ऐसा नहीं है. अब तो सोचते हैं कि कम से कम बंदा मिल रहा है. बात कर रहा है. यह लोग हमें पूछते हैं.

अब जिस पोजिशन में हैं आप. जिस तरह का आपको एक्सपोजर मिल रहा है. बाहर की फिल्में भी आप देख रहे हैं. हमारी फिल्मों की क्या खासियत है और बाहर की फिल्मों से हमें क्या लेना चाहिए?

मुझे एक ही चीज लगती है. हमारी फिल्मों में डांस और गाने की परंपरा है. वह हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की पहचान है. वह हमारी फिल्मों को बनाती है. बाहरी की फिल्मों की तुलना में हमारे फिल्मों के संगीत और डांस प्रमुख हैं. यह हमारी ही सभ्यता है. हम बचपन से लेकर अभी तक इसे देखते हुए आ रहे हैं. राज कपूर के रमैया वस्ता वैया से लेकर टाइगर श्राफ तक यही देखने को मिलेगा. हमारी यह यूनिक पहचान है. छोटे शहर से लेकर बड़े शहर तक इसका आंनद उठाते हैं. वहां की फिल्मों के एक्टर किरदार को बड़ा मानते हैं. वहां पर बड़े एक्टर छोटा किरदार निभाने में हिचकिचाते नहीं हैं. हमारे यहां यह समस्या हैं. हमारे एक्टर किरदार की लेंथ पर ध्यान देते हैं. हमारे एक्टर खुले दिमाग के नहीं हैं. एकाध एक्टर हैं, जो ऐसा नहीं सोचते हैं. इरफान खान और नवाजुद्दीन सिद्दिकी किरदार को बड़ा मानते हैं. बाकी के एक्टरों को परफॉरमेंस पर ध्यान देना चाहिए. लेंथ की चिंता नहीं करनी चाहिए.

आपकी फिल्ड में पहले से कोई पायनियर रहा नहीं. कास्टिंग के क्षेत्र में आपका आइडियल रहा नहीं है. यह रास्ता आपने खुद खोजा है. थोड़ा-बहुत छुटपुट तरीके से लोग काम करते रहे हैं. यहां पर आपके पहले कोई ब्रांड नहीं बन पाया है. फिर भी काम करते हुए आपको खुद की सुधारने की जरूरत महसूस हुई? या विदेशों से उदाहरण ले लें. ऐसे कौन के लोग हैं,जिनकी कास्टिंग आपको अच्छी लगती हो?

मुझे हनी त्रेहन का काम बहुत अच्छा लगता है. वह मेरे भाई की तरह हैं. मुझे उनका काम अच्छा लगता है. उन्होंने मेरी काफी मदद भी की है. उन्होंने ‘तलवार’ किया. ‘ओमकारा’ किया. ‘कहानी’ का काम मुझे उनका बहुत पसंद है. दूसरा काम मुझे जोगी का अच्छा लगता है.

जोगी एक तरह से दिल्ली में कास्टिंग के पायनियर हैं.

जी. मैंने उनका काम देखा है. जिस तरह से वह काम करते हैं, वह बेहतरीन लगता है. मैं इन दोनों को कहता था कि आप सबके साथ काम करो. मुझे लगता था कि इन दोनों को बाहर निकलकर काम करना चाहिए. मैंने हमेशा से कोशिश की है कि किसी एक प्रोडक्शन हाउस या डायरेक्टर के साथ काम नहीं करना है. मुझे हर फिल्ममेकर के साथ काम करना था. मुझे हर चीज का अनुभव लेना है. मेरा काम ही कास्टिंग डायरेक्टर का है. मुझे छोटे-बड़े और नए हर फिल्ममेकर के साथ काम करना है. सबके साथ मुझे काम करना है. मैं किसी एक के साथ बंध कर नहीं रहना चाहता हूं. मुझे बच्चों की फिल्म भी करनी थी. मुझे ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ भी करनी थी. अगर मैंने ‘बजरंगी भाईजान’ करनी थी, तो साथ में ‘मसान’ पर भी काम करना था. मुझे हर तरह की फिल्में करनी हैं. मुझे लगता है कि उन दोनों को अपने दायरे से बाहर आकर काम करना चाहिए.

वह लोग कहीं बंधे हुए से हैं?

जी, उनको बाहर आना चाहिए. उनका काम बहुत अच्छा है. आप को बताना चाहता हूं कि यह ऑफिस और सेटअप मैंने इस वजह से ही बनाया था. एक तो मैंने अपना जॅाब छोड़ दिया था. दूसरा प्रोफेशनल दिखने के लिए मैंने ऐसा किया था. प्रोफेशनल बनने के लिए यह जरूरी था. मुझे ऐसा लगता था कि कैफे कॅाफी डे और बरिस्ता हो गया. अब एक सिस्टम के साथ काम करना चाहिए. एक सही जगह होनी चाहिए. जहां लोग आएं. यहां पर ऑडिशन दें. मैंने घर बनाने की जगह पहले ऑफिस बनाने का सोचा. यह मेरे लिए सबसे प्रमुख था. यहां पर लोग बैठ सकते हैं. शहर में कई सारे एक्टर घूम रहे हैं. किस तरफ जाना है, उन्हें नहीं पता. एक जगह तो उनके काम के लिए होनी चाहिए. अब इस जगह के बारे में सभी को पता है. मेरे लिए यह सबसे आवश्यक था.

पहले किसी कास्टिंग डायरेक्टर का ऑफिस नहीं था. पहले एक छोटे से रूम में बैठकर काम होता था. जब एक निर्माता का ऑफिस हो सकता है. निर्देशक का ऑफिस हो सकता है. फिर हमारा ऑफिस क्यों नहीं हो सकता है. इस वजह से मैंने सिस्टम में बैठाया है. एक कंपनी बनाई है. बाहर के लोग भी इस प्रोफेशन का सम्मान करें. उन्हें लगें कि कास्टिंग फिल्ड सही दिशा में जा रही है. यह सारी चीजें सोचकर मैंने ऑफिस का निर्माण किया.

(पार्ट-2अगले हफ्ते)

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