अजय ब्रह्मात्मज

उत्तर प्रदेश में फिल्मसिटी: एक अदद शुद्ध संस्कारी फिल्म इंडस्ट्री की खोज

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स्क्रीन राइटर प्रेमचंद और सेंसरशिप

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पार्ट-2: सुशांत सिंह राजपूत मेरे लिए ‘है’, उसके लिए मैं कभी भी ‘था’ इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा

पार्ट-2: सुशांत सिंह राजपूत मेरे लिए ‘है’, उसके लिए मैं कभी भी ‘था’ इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा

पार्ट-1: मुझे ‘गैंग्स ऑफ   वासेपुर’ भी करनी थी साथ में ‘बजरंगी भाईजान’ करनी थी

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दो भवन, एक विरासत और एक कपूर खानदान

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इरफान: “यहां नेटवर्किंग से काम मिलता है, सिर्फ अपने टैलेन्ट से नहीं”

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संग-संग : सुतपा सिकदर और इरफान खान के साथ

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फिल्म इंडस्ट्री को एक्शन में आने में लगेगा लंबा वक्त

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फिल्मी कारोबार को लगा कोरोना का टोना

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स्टीरियोटाइप राष्ट्रवादी एजेंडा के खिलाफ खड़ी है ‘शिकारा’

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रिचा चड्ढा पार्ट 2: ‘लोकतंत्र में तो विपक्ष में रहना ही चाहिए’

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रिचा चड्ढा: सिर फोड़ कर आप सोच नहीं बदल सकते…

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रंग की वजह से कई रिजेक्शन मिले: उषा जाधव

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सरकारी फिल्म फेस्टिवल का 50वां आयोजन

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मामी फिल्म फेस्टिवल : ज़िन्दगी के कठोर धरातल पर उगी चंद फ़िल्में 

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पार्ट 2: ‘मेरा काम बड़े फिल्मकारों को काम देने के लिए मजबूर कर देगा’

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तापसी पन्नू: ‘मुझे एहसास है कि आज जिन सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रही हूं, कल उन्हीं से उतरना भी है’

तापसी पन्नू: ‘मुझे एहसास है कि आज जिन सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रही हूं, कल उन्हीं से उतरना भी है’

ख़रामा ख़रामा हिंदी से हिंग्लिश होती हिंदी फिल्मों की संस्कृति

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कैसे और क्यों अपने ही देश में पहचान खोकर हम पराए और शरणार्थी हो गए: संजय सूरी

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दीपक डोबरियाल: ‘बेइज्जती’ सहो, उन्हें स्वीकार करो, कभी रिएक्ट मत करो और खुद में सुधार करो

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मखौल या मज़ाक नहीं है मीडिया प्रतिबंध 

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हिंदी सिनेमा 2019: विविधता और कामयाबी की पहली छमाही

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‘मैं खुद में लखमीचंद को और लखमीचंद में खुद को देखने लग गया हूं’: यशपाल शर्मा

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वेब सीरीज़ पर आसन्न सेंसरशिप का खतरा

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पीएम नरेंद्र मोदी: फैक्ट की टूट और फिक्शन की लूट से तैयार विडंबना

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स्वच्छंद वेब सीरीज़ को नाथने की कोशिश

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अख़्तरी: आज़ादी के आर-पार फैली एक शख़्सियत का अफ़साना

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कॉन्सपिरेसी थियरी के मकड़जाल में फंसी हुई ‘द ताशकंद फाइल्स’

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‘दरबारी बनना तो आपका फैसला है’

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मनोज बाजपेयी: हम मिडियोक्रिटी का जश्न मनाने वाला देश बन गए हैं

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पुलवामा से लेकर बालाकोट तक युद्धोन्माद का फिल्मी कोरस

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‘लड़के-लड़की की बराबरी ने मोहब्बत को वास्तविकता के धरातल पर ला दिया है’

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गजराज राव पार्ट 2: ‘मुझे किसी की सफलता से ईर्ष्या नहीं होती है’

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‘संघर्ष के दिनों में मैंने तय किया कि न गांजा पीऊंगा, न शराब’

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2018: परदे के आगे से ज्यादा तब्दीलियां परदे के पीछे आ रही

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“पानीपत पर कोई फिल्म बने इसमें मराठों को दिक्कत नहीं होनी चाहिए”

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पार्ट 4: राष्ट्रवाद और प्रचलित राजनीति का मोहरा बन गई ऐतिहासिक फिल्में

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पूरी तटस्थता के साथ बनी है ‘मोहल्ला अस्सी’: डॉ. काशीनाथ सिंह

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ऐतिहासिक फिल्में पार्ट 3: यथार्थ और ख्याली दुनिया का कॉकटेल

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भारत में भी लाहौरी ही रहे प्राण नेविले

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#MeToo: मुंबई फिल्म उद्योग का खुला और घिनौना सच

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पार्ट 2: आज़ादी के पहले आई बोलती फिल्मों की क्रांति

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पार्ट-1: ऐतिहासिक मूक फिल्मों का इतिहास

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हंसल मेहता पार्ट-2: ‘भारत अकेला देश है, जहां लोकतंत्र रोजाना ख़तरे में है, फिर भी लोकतंत्र कायम है’

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फिल्म समीक्षा: हिज्जों में असर छोड़ जाने वाली फिल्म है गोल्ड

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हंसल मेहता पार्ट-1: ‘रोहित वेमुला की मौत तिल-तिल कर मर रहे समाज का अक्स है’

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कास्टिंग: कॉन्टैक्ट, कंटेस्ट, काउच और कम्प्रोमाइज़

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“यहां किरदार विजय तेंदुलकर के नाटकों की तरह केंद्र में हैं”

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रिचा चड्ढा: मर्द की भाषा औरतें क्यों नहीं बोल सकती?

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जादुई सिलिंडर: आवाज़ रिकॉर्डिंग की शुरुआती दुनिया

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बेमौके रेडकार्पेट पर इठलाती अभिनेत्रियां मौके पर गैरहाज़िर

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राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह: “एक अहंकारी मंत्री की दीवार पर टंगने की ख्वाहिश”

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पोस्टर ही पहली झलक है फिल्म  की

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इरफान और मनोज बाजपेयी: कहानी ‘आउटसाइडरों’ की

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रेड: हिंदी समाज की बुनावट वाले चरित्रों की कहानी

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अवसाद और असलियत का पोर्ट्रेट, कड़वी हवा

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