पार्ट-2: सुशांत सिंह राजपूत मेरे लिए ‘है’, उसके लिए मैं कभी भी ‘था’ इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा
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पार्ट-2: सुशांत सिंह राजपूत मेरे लिए ‘है’, उसके लिए मैं कभी भी ‘था’ इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा

सुशांत सिंह की आखिरी फिल्म दिल बेचारा की रिलीज से पहले निर्देशन मुकेश छाबड़ा उन्हें किस तरह से याद कर रहे हैं.

By अजय ब्रह्मात्मज

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मैं किस्से और कहानियों पर फिर जाना चाहूंगा. आपने एक पंकज का किस्सा सुनाया. उसके अलावा कुछ और बताना चाहेंगे?

शायद यह आपको पता नहीं है कि राजकुमार राव ने ‘काय पो छे’ का ऑडिशन पहले ही दे दिया था. तब उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया था. इस फिल्म के लिए अभिषेक कपूर मेरे पास आए. उन्होंने कहा कि कैसे तीन लड़के मिलेंगे? वह खुद मेरा इंटरव्यू ले रहे थे. मैंने सोचा कि यह आदमी मेरी ही काबिलियत को जज कर रहा है. मैंने ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ कर लिया था. अभिषेक ने कहा कि कैसे संभव है? मैंने कहां कि हो जाएगा. मैंने जब स्क्रिप्ट देखते ही कहा था कि यह राजकुमार का किरदार है. अभिषेक ने कहा कि नहीं. हमने पहले ही उसे रिजेक्ट कर दिया है. उन्होंने मुझे एक सूची भेजी थी.

इसमें जिन एक्टरों के ऑडिशन हो गए थे, उनका नाम लिखा हुआ था. मैंने कहां कि ठीक है. मैं इससे पहले राजकुमार के साथ ‘शाहिद’ और ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ में काम कर चुका था. मैं उसकी क्षमता जानता हूं. मैंने देखा है उसका काम. मैंने राजकुमार को निजी तौर पर ऑडिशन किया. ऑडिशन करके फाइल अपने पास रख ली. इसी तरह मैंने सुशांत और अमित साद का भी ऑडिशन ले लिया था. इनके साथ कई दिन तक काम किया. मैंने फिर तीनों को इकट्ठा कर पंद्रह दिन तक वर्कशॅाप की. मैंने फाइनल ऑडिशन जाकर अभिषेक को दिखाया. तब उन्हें बाकी दो के साथ राजकुमार का काम पसंद आया. उन्होंने कहा कि राजकुमार ने कैसे कर लिया. मैंने कहा कि आपका ऑडिशन करने का तरीका गलत है.

प्रॉसेस के बीच अमित साद फिल्म छोड़ कर चला गया. राजकुमार को अभिषेक ने मना कर दिया. उन्हें राजकुमार जम नहीं रहे थे. उन्हें उनके पतले शरीर पर समस्या था. इन तीनों को लेकर समस्या हो रही थी. मैंने उनके साथ वर्कशॅाप की. सुशांत ने एक महीने में शारीरिक तौर पर खुद को बदला. अमित साद के बदले हमने किसी और को कास्ट कर लिया था. वर्कशॅाप के समय मैंने अभिषेक से कई बार कहा कि अमित ही इस रोल के लिए सही है. अभिषेक नहीं मान रहे थे. मैंने फिर अमित को बुलाया. उनसे पूछा कि आप यह फिल्म छोड़ कर क्यों चले गए? अमित ने कहा कि मुझे तीन हीरो की फिल्म में काम नहीं करना है. मैंने उसे समझाया. मैं उसे वापस फिल्म में लेकर आया. सुशांत ने अपने आप में शारीरिक बदलाव किया. राजकुमार ने अपने काम से प्रभावित किया. इस तरह तीनों को मैंने अभिषेक के सामने रख दिया. फाइनल ऑडिशन देखकर हर कोई चकित रग गया. किसी ने ना नहीं कहा. आज जो लोग ‘काय पो छे’ की बात करते हैं, उसमें यह तीनों एक्टर रिजेक्ट हो चुके थे. बड़ी मुश्किल से तीनों इस फिल्म में काम कर पाए.

और कोई किस्सा?

‘बजरंगी भाईजान’ की बच्ची के साथ भी ऐसा प्रोसेस हुआ है. इस फिल्म के लिए मुझे मासूम चेहरा चाहिए था. जुगल हंसराज की जो ईमेज मुझे तोड़नी थी. उनकी ‘मासूम’ मैं महीने में दो बार जरूर देखता हूं. मुझे उनके मासूम चेहरे ने पकड़ कर रखा है. अगर मैंने भविष्य में कभी फिल्म बनाई तो मैं इस बात को ध्यान रखूंगा कि ‘मासूम’ ने मुझे क्यों आकर्षित किया. हर सीन मेरे दिमाग में घूमता रहता है. हर्षाली मल्होत्रा के साथ भी ऐसा ही है. मैंने कबीर खान को कहा था कि फिल्म की कहानी बेस्ट है. सलमान खान हैं इसमें, लेकिन यह फिल्म बच्ची की भी है. मैंने इसके लिए कई सारे ऑडिशन किए. पचास-साठ ऑडिशन हमने किए.

ऑडिशन के समय मैं हर्षाली को एक तरफ बैठा देता था. वह बड़ी ही मासूमियत से ऑडिशन देखती थी. उसके बैठने और उठने में मासूमियत थी. इस फिल्म में मुन्नी के किरदार का कोई डायलॅाग नहीं था. कबीर खान के दिमाग में एक और बच्ची थी. हम इन दोनों को लेकर सलमान भाई के पास गए. जैसे ही सलमान के साथ बच्ची ने इंटरेक्ट करना शुरू किया. सलमान को हर्षाली पसंद आयी. ‘चिल्लर पार्टी’ में फटका का किरदार निभाने वाला बच्चा रेड लाइट पर मिला था.

मुझे लोखंडवाला के रास्ते पर रेड लाइट के पास यह बच्चा दिखा था. तभी मैंने इसे फटका के किरदार के लिए चुन लिया था. मुझे विश्वास था कि कि ‘चिल्लर पार्टी’ के हिसाब से उसी समाज के हिसाब से कास्ट करना अच्छा होगा. वरना कहानी से बच्चों का मेल नहीं हो पाएगा. फिर मैंने उस बच्चे को फॉलो किया. हीरा-पन्ना मॉल के बाद एक एरिया आता है. हम उस बच्चे के घर गए. बच्चे की मां को लगा कि हम बच्चा चोर हैं. उसने हमें भगाने की कोशिश की. हमने बच्चे की मां को मनाया. उन्हें समझाया. हमने छह दिन बच्चे को अपने साथ रखा. उसे फिल्म के बारे में बताया. एक्टिंग करना थोड़ा बहुत समझाया. हमें उस बच्चे की आवाज बहुत पसंद थी. उसके अंदर एक टेक्स्चर था. हमने सारे बच्चों को कास्ट करने के बाद वर्कशॉप शुरू की. वह सारे बच्चों से घुल-मिल गया. वह ट्रेंड हो गया था. उस बच्चे को नेशनल अवार्ड मिला. हमें बहुत खुशी मिली. आगे चलकर एक-दो फिल्म में हमने उस बच्चे को कास्ट किया. ‘काय पो छे’ में भी उस बच्चे को कास्ट किया.

क्या नाम है उसका?

इरफान खान.

वह अभी क्या कर रहा है?

उसने एक-दो फिल्में और की हैं. वह अपने मुहल्ले का स्टार है. अब वह सोशल मीडिया पर भी है. वह स्लम का बच्चा. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता है.

आपका काम भाता है. फिल्म समीक्षा में एक लाइन में कास्टिंग की सराहना की जाती है. बात खत्म हो जाती है. ऐसी और क्या खूबी है. जिसे अधिक सराहा जाना चाहिए? उसके प्रति क्या नजरिया रखा जाए ताकि कास्टिंग पर भी लोगों का ध्यान जाएं?

मैं चाहता हूं कि छोटे किरदारों के बारे में ज्यादा लिखा जाना चाहिए. छोटे किरदार को अनदेखा कर दिया जाता है. छोटे किरदारों के कारण पूरा सीन बनता है. ऊपर के तीन-चार लोगों के बारे में लिखा जाता है. बाकी को नहीं पूछा जाता है. छोटे किरदार निभाने वाले एक्टरों के बारे में लिखा जाना चाहिए. वह कहां से आए? वगैरह-वगैरह. उन एक्टरों से बातचीत करनी चाहिए. उन पर लिखना चाहिए. तीन-चार स्टार के अलावा भी सभी से बात करनी चाहिए. इससे दर्शकों को प्रॉसेस के बारे में पता चलेगा. दर्शकों को छोटे किरदारों में कास्ट होने वाले एक्टरों की अहमियत पता चलेगी. केवल इतना कहा जाता है कि फिल्म में वेटर का रोल उस लड़के ने अच्छा किया था. इसके साथ उस लड़के का नाम और बाकी की जानकारियां भी लिखनी चाहिए. लिखने पर ही लोगों को पता चलेगा. यह होना जरूर है.

हम लोगों ने नाजिर हुसैन और इख्तियार को पहले की फिल्मों में एक जैसी भूमिकाओं में ही देखा है. हमने ‘दीवार’ में इख्तियार को पुलिस के रोल में ही देखा है. इससे कहानी में कोई बड़ा अंतर नहीं आया है. वह तकरीबन हर फिल्म में पुलिस का ही किरदार निभाते थे. मेरे कहने का मतलब यह है कि कास्टिंग के कारण फिल्म के अंतिम प्रभाव पर फर्क पड़ता है. मान लीजिए हम अनुपम खेर को चाचा के किरदार में हमेशा देखते रहे हैं. अभी हम देखते हैं कि हर फिल्म में नया चाचा आ जाता है.

मुझे लगता है कि किरदार में ताजगी फिल्म का समर्थन करती है. फ्रेश चेहरे से दर्शक कहानी में अंदर तक शामिल हो जाते हैं.

क्या चीज है जो अपील करती है?

किरदार में ताजगी होनी चाहिए. किसी एक्टर को नए किरदार में देखकर हम सोचने लगते हैं. हम उसकी परफॉरमेंस देखते हैं. उस पर उसकी पुरानी फिल्मों का बैगेज नहीं होता है. हम किरदार की भावनाओं में उस एक्टर को देखते हैं. हम ‘नीरजा’ में उसके पिता को देखते हैं. ‘क्वीन’ में हमने उसके माता-पिता को देखा है. आपको किरदार दिखता है ना कि एक्टर. ‘गैंग्स गैंग ऑफ़ वासेपुर’ में कई अपरिचित चेहरे थे. जाने-पहचाने चेहरों का उस फिल्म में काम नहीं था. वह फिल्म काम नहीं कर पाती. ‘काय पो छे’ तीनों लड़के अगर स्टार होते तो काम नहीं चलता. स्क्रीन पर तीनों किरदारों की दोस्ती नहीं दिखती. फिल्म में फ्रेशनेस देना बहुत जरूरी होता है ताकि लोगों को लगे कि सच में कहानी में ऐसा हो रहा है. स्क्रीन पर काम दिखता है. ‘कपूर एंड संस’ में फवाद खान नहीं होता तो फिल्म वर्क नहीं करती. इस वजह से फ्रेश चेहरा होना जरूरी है.

आपका क्षेत्र और बाकी हिंदी सिनेमा किस तरफ आगे जा रहा है? आपको क्या लग रहा है?

हिंदी सिनेमा अच्छी कहानियों की तरफ जा रहा है. आगे चलकर फिल्मों में कहानी चलेगी और कुछ नहीं चलेगा. अच्छा कंटेंट, कास्ट और डायरेक्शन चलेगा. मुझे नहीं लगता है कि अब स्टार देखा जाएगा. अब किसी भी बड़े स्टार की फिल्म बनाएं कुल मिलाकर कहानी मायने रखती है. कहानी कहने का तरीका अहमियत रखता है. अब लोगों को चीजें समझ में आने लगी हैं. हमें सम्मान मिलने लगा है. हमें एक्टर, डायरेक्टर, निर्माता और लोगों की तरफ से सम्मान मिल रहा है. मुझे लगता कि इस क्षेत्र में आगे आयेंगे. जिस तरह लोग एडिटिंग का कोर्स करने जाते हैं. बाकी के फिल्ममेंकिग का काम सीखते हैं. उसी तरह कास्टिंग का कोर्स होगा.

कास्टिंग की पढ़ाई कहीं हो रही है क्या?

जी अभी तक नहीं हो रही है. मैं इसे शुरू करने की सोच रहा हूं. एफटीटीआई और बाकी के फिल्म संस्थानों में मैं इसे शुरू करने की सोच रहा हूं. जहां पर बाकायदा इसका एक कोर्स हो.

खुद की फिल्मों की बढ़त कैसे देख रहे हैं. और कैसे आगे जा रहा है?

अच्छा जा रहा है. पहले कास्टिंग के क्षेत्र का काम छुपा हुआ था. जैसे ही वह सामने आएगा, वैसे ही इसकी पहचान बढ़ेगी. आने वाले समय में कास्टिंग सिनेमा का मजबूत खंभा बन जाएगा. हमें ही सबसे पहले आगे रखा जाएगा. अच्छे एक्टर और नए चेहरों का होना जरूरी है. वरना अच्छी फिल्में नहीं बनेंगी. हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. नए-नए बच्चे अच्छे से काम कर रहे हैं. कास्टिंग में नए बच्चे आ गए हैं. वे सारे अच्छा काम कर रहे हैं. कई लोग अभी भी कास्टिंग में रहकर उसे समझ नहीं पा रहे हैं. इस वजह से वे लोग वहीं रुके हुए हैं. जो समझ रहा है, वह निरंतर आगे बढ़ रहा है.

यानि कि भविष्य अच्छा है?

जी, बिल्कुल. और लोगों को भी आना चाहिए. यह चक्र की तरह है. हम जायेंगे तो नए लोग कास्टिंग के क्षेत्र में आयेंगे. हर तरह के लोग आते हैं. बदलाव होता है. हम सबका वक्त आया है. बाकी के लोगों का भी वक्त आएगा.

कास्टिंग को कैसे समझाएंगे. कास्टिंग डायरेक्टर का काम क्या होता है?

कास्टिंग डायरेक्टर का काम डायरेक्टर के विजन को पूरा करना होता है. किरदार के लिए सही एक्टर को कास्ट करने की जिम्मेदारी कास्टिंग डायरेक्टर की होती है. सही किरदार के लिए सही एक्टर नहीं चुनने पर डायरेक्टर का विजन अधूरा रह जाता है. अच्छे एक्टर को सही तरीके से ऑडिशन करना आना चाहिए. ऐसा नहीं हुआ तो कास्टिंग डायरेक्टर की कोई अहमियत नहीं रहती है.

संक्षेप में बताएं कि प्रोसेस क्या होता है?

सबसे पहले हमें स्क्रिप्ट मिलती है. हम उसे पढ़ते हैं. स्क्रिप्ट के आधार पर हम काम शुरू करते हैं.

आप हर स्क्रिप्ट पढ़ते हैं?

जी. बिना पढ़े हमें डायरेक्टर का विजन नहीं समझ में आएगा. फिर हम डायरेक्टर के साथ मुलाकात करते हैं. फिर हम कहानी का कॉमन ब्रीफ बनाते हैं. फिर हम एक्टर की खोज करते हैं. हर डायरेक्टर का विजन और एक्टिंग को देखने का तरीका अलग होता है. अनुराग के एक्टर को इम्तियाज नहीं पसंद कर सकते हैं. इम्तियाज के एक्टर को कबीर पसंद नहीं करेंगे. हमें उन डायरेक्टर के विजन को ध्यान में रखते हुए एक्टर कास्ट करने पड़ते हैं. एक्टरों का ऑडिशन करते हैं. फिर फाइनल ऑडिशन होता है. को-एक्टर के साथ ऑडिशन किया जाता है. एक्टर का समय देखना पड़ता है. इन सारी चीजों को देखने के बाद एक एक्टर कास्ट किया जाता है. हम ज्यादातर उन लोगों को पसंद करते हैं, जिन्हें लेकर हमारी सोच साफ और सही रहती है. हमारी किरदार और एक्टर को लेकर दुविधा खत्म हो जाती है. तब हम एक्टर को फाइनल हां कहते हैं. यह बहुत ही लंबा प्रोसेस है.

यह प्रोसेस कितना लंबा होता है?

एक अच्छी फिल्म की कास्टिंग के लिए तीन महीने का समय लगता है. जैसे ’गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’, ’पीके’ और ‘दंगल’ फिल्म है. यह सब बड़ी फिल्में हैं. इनमें कास्टिंग ज्यादा है. इन दोनों फिल्म के लिए मुझे एक साल का समय लग गया था. यह फिल्म के स्केल पर निर्भर करता है. फिल्म की कहानी और एक्टर की संख्या मायने रखती है. ये तीनों फिल्म मल्टीस्टारर हैं. मैं वक्त मांग लेता हूं. मुझे उतना वक्त मिल जाता है.

ऐसे कौन से डायरेक्टर हैं, जिनके साथ काम करते हुए आपकी सोच को पर्याप्त जगह मिली. मैं किसी की अच्छाई या बुराई के बारे में नहीं पूछ रहा हूं.

अनुराग कश्यप, राजकुमार हिरानी, इम्तियाज अली, विशाल भारद्वाज, विकास बहल. लगभग सभी. इन सभी ने मेरे हर फैसले को सुना. अपने फैसलों का मुझे हिस्सा बनाया. अनुराग तो मुझसे पूछ लेते हैं कि एक्टर का तुमने ऑडिशन देखा. मेरे देखने के बाद वह ऑडिशन भी नहीं लेते हैं. अगर मैं उनकी फिल्म में कास्ट भी नहीं कर रहा हूं तो भी मेरी राय जरूर लेते हैं. वह मुझ पर भरोसा करते हैं. सभी डायरेक्टर मुझ पर भरोसा करते हैं. अभिषेक कपूर भी कुछ करते हैं तो मुझे फोन करके जरूर पूछते हैं.

अगर मुझसे कुछ छूट गया हो तो आप बताना चाहेंगे?

नहीं. आपके साथ तो अच्छा लगता है. मैं हिंदी में आपसे आसानी से बात कर लेता हूं. अंग्रेजी में शब्द बनाने की जरुरत नहीं पड़ती है. हिंदी हमारी मातृभाषा है. आप तो वैसे भी सब पूछ लेते हो. और हां, कबीर खान भी बहुत विश्वास करते हैं. जितने भी डायरेक्टर का नाम लिया, वे सभी मुझसे पूछते हैं. इससे ज्यादा मुझे और क्या चाहिए? ‘मसान’ के समय नीरज घेवन ने मुझे सुना. हमें इज्जत दी. हमने उन्हें इज्जत दी. मैंने उसे चार साल पहले कह दिया था कि मैं तेरी पहली फिल्म करूंगा. अगर हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा? हम पैसों के बारे में सोचेंगे तो हमारे बारे में कौन सोचेगा. एक दिन हमें भी अपनी पहली फिल्म बनानी है. जो भी पहला काम कर रहा है, उसके साथ सबको जुड़ना चाहिए. अच्छी फिल्म है तो सारे अच्छे लोगों को साथ में आना चाहिए.

अब आप डायरेक्शन की तरफ जा रहे हैं. इस फील्ड में आने के बाद आखरी मकसद डायरेक्टर बनने का ही होता है. क्या आप अपने काम से संतुष्ट नहीं हैं?

मैं बहुत खुश हूं. मुझे जिंदगी भर इसी प्रोफेशन में रहना है. मैं कास्टिंग नहीं छोड़ सकता हूं. आप देखेंगे कि बहुत सारे डायरेक्टर निर्माता और लेखक भी हैं. जब वह लोग दो-तीन काम एक साथ कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकता हूं? इम्तियाज अली और अनुराग कश्यप और फरहान अख्तर भी दो-दो काम एक साथ कर रहे हैं. मैं भी कर सकता हूं.

कैमरामैन या संगीत निर्देशक जैसा कोई डायरेक्टर बनता है तो अंचभित करने वाली बात होती है?

पर क्यों.

जैसे इरशाद कामिल डायरेक्टर बनेंगे तो सवाल उठाया जाएगा.

हम सब फिल्मी प्रोसेस में हैं. हममें से कोई भी डायरेक्टर बन सकता है. मैं कास्टिंग नहीं छोड़ रहा हूं. मैं जीवन भर करता रहूंगा.

आपकी एक फिल्म आयी. वह सफल हुई. आपने दूसरी फिल्म बनाई. उसके बाद तीसरी. इस वजह से आपकी प्राथमिकता बदलने लगती है.

सर मैं बदलने ही नहीं दूंगा. आप देखना. मैं दोनों काम करूंगा.

कहीं थोड़ा सा फर्क में देखता हूं. एक्टिंग, डायरेक्शन और राइटिंग. खुद की परफॉरमेंस होती है. पर कास्टिंग में डायरेक्शन का काम थोड़ा सा अलग है?

सर मुझे लगता है कि कास्टिंग का काम डायरेक्शन के सबसे करीब होता है.

हां यह मैं भी मानता हूं कि डायरेक्शन के करीब होता है. हालांकि उतना ही बड़ा भारी काम होता है.

हां. मैं इस बात से सहमत हूं. पर प्रॉसेस वही होता है. मुझे हर फिल्म प्रॉसेस से जुड़ना है. मेरे लिए पूरी फिल्म इंडस्ट्री एक फिल्म स्कूल है. मुझे किसी फिल्म स्कूल में जाने की जरुरत नहीं है. मैंने यहीं से सीखा है. क्रिएटिव फील्ड से जुड़ा हर आदमी हर तरह की चीजों में हाथ आजमाता है. डीओपी भी एक्टिंग करते हैं. ‘लव आज कल’ में जिन्होंने शूट की, वह साउथ में चर्चित विलेन हैं. इसी तरह हर कोई कर सकता है. अनिल मेहता ने भी फिल्म बनायी है. वह भी डीओपी रह चुके हैं.

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मुकेश छाबड़ा की फिल्म ‘दिल बेचारा’ 24 जुलाई को असामान्य स्थितियों में डिज्नी-हॉटस्टार पर आएगी. इस दौरान 14 जून को फिल्म के नायक सुशांत सिंह राजपूत की अक्समात मौत ने माहौल को ग़मगीन बना दिया है. उन्होंने आत्महत्या कर ली. डिस्नी-हॉटस्टार ने उनकी याद में फिल्म का प्रदर्शन सभी के लिए फ्री कर दिया है. ‘दिल बेचारा’ के निर्देशक मुकेश छाबड़ा के लिए या सब कुछ अवर्णनीय था फिर भी उन्होंने कुछ सवालों के जवाब दिए...

आप की बातचीत में आरम्भ से यह संकेत मिलता है कि आपको निर्देशन में जाना था. फिल्म यूनिट के तकनिकी विभागों से जुडी प्रतिभाएं डायरेक्टर बन सकती हैं तो कास्टिंग डायरेक्टर क्यों नहीं? यह अवसर कैसे मिला या आप ने इसे जुटाया?

मैंने आपको पहले भी औपचारिक और अनौपचारिक बातों में बताया है कि कास्टिंग के लिए ऑडिशन करते समय मन में आता था कि मौका मिलेगा तो मैं फिल्म बनाऊंगा. मैं लगतार सीख रहा था. तैयारी कर रहा था. थोड़ा विश्वास बंधा तो अवसर मिलने पर उसे स्वीकार कर लिया. मेरी पहले से ही तमन्ना थी कि कभी ‘चिल्लर पार्टी-2’ बनाऊंगा. या कोई और पिक्चर बनाऊंगा. यह अवसर मुझे फॉक्स के रुचा पाठक से मिला. शशांक खेतान के साथ फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम करते हुए मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. साथ में लोग जुड़ते चले गए. अच्छी टीम बन गयी और अब पिक्चर बन गयी.

डायरेक्शन की दिशा में भी अभ्यास चल रहा होगा न? कभी शूट पर रहते समय डायरेक्शन की ज़रूरतों पर गौर करना आदि...

मैं ‘कमीने’ में विशाल भरद्वाज का सहायक था. सेट पर ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ के समय अनुराग कश्यप के साथ रहा. इम्तियाज़ अली के सेट पर रहा. सीखने का काम तो ‘रंग दे बसंती’ की कास्टिंग में सहायक रहने के दौरान ही शुरू हो गया था.

आप की फिल्म का ट्रेलर देखते हुए स्पष्ट है कि जिन निर्देशकों के साथ आप की ज्यादा सोहबत रही, उनका असर नहीं है. यह सचेत कोशिश है या आप अपनी शैली और एप्रोच के साथ आएं?

सही कह रहे हैं. अनुराग कश्यप और इम्तियाज़ अली के साथ मेरी ज्यादा सोहबत रही. मैंने अभी के हर बड़े डायरेक्टर के साथ काम किया. मेरी यही कोशिश रही कि किसी का असर ने दिखे. अपना फ्रेश एप्रोच दिखे. यहां बहुत जल्दी टैग कर देते हैं कि उनके या उनके स्कूल से आया है. यह सचेत कोशिश रही कि सभी से सीखूं, लेकिन आवाज़ मेरी खुद की हो.

डायरेक्शन करते समय किसी आदर्श डायरेक्टर का रेफरेंस भी तो हो सकता है. या फिर मूल फिल्म के निर्देशक रहने की कोशिश. आप जैसा कि बता रहे हैं यह उन सभी से अलग और आप की सोच समझ है.

मैंने किसी को फॉलो करने की कोशिश नहीं की. अपनी टीम के साथ ही इवॉल्व हुआ. मैं ढेर सारे समकालीन निदेशकों का फैन हूं, लेकिन किसी के भी स्पष्ट प्रभाव से बचा रहा. वैसे यह बात सच है कि हम सभी सीखते हैं तो कुछ निर्देशकों की शैली दिमाग में रह जाती है. फिल्म बनाते समय मेरी यही कोशिश रही कि किसी की छाप न आये. मेरी तकनीकी टीम और सुशांत ने काफी मदद की. एआर रहमान ने कितनी बातें बतायीं. राजू हिरानी ने गाइड किया. बताते रहे बीच-बीच में शूटिंग के दौरान राजू सर से बात होती रही.

संगीत के लिए रहमान साहब को कैसे तैयार किया? क्या उन्हें फॉक्स लेकर आया?

उनको मैं ही लेकर आया. बचपन से उनको सुनता रहा हूं. उनका दीवाना रहा हूं. इम्तियाज़ की फिल्मों में उनके संगीत को सुनता रहा हूं. उनके संगीत से सजी अनेक फिल्मों में मैं कास्टिंग डायरेक्टर रहा हूं. वे मेरे नाम से वाकिफ तो थे ही. मैंने उन्हें मेसेज किया कि मैं अपनी पहली फिल्म बना रहा हूं. मैं आप से मिलना चाहता हूं. दो मिनट में उनका जवाब आ गया. उसके कुछ दिनों बाद वे एक शादी के सिलसिले में मुंबई आये थे तो मैंने और शशांक खटान ने उन्हें फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाई. मैं मिल कर लिफ्ट से उतर ही रहा था कि उन्होंने हां बोल दिया. लोगों ने बता रखा था कि उन्हें राजी करना मुश्किल काम है. मैंने सोचा कि ईमानदारी से सीधे आग्रह करना ठीक रहेगा. और वह कारगर रहा.

आपकी फिल्म ‘देल बेचारा’ के नायक मिनी और नायिका किज्ज़ी के बारे में बताएं? कौन हैं और क्या कहना चाहते हैं?

संक्षेप में दोनों यही कह रहे हैं कि अपनी ज़िन्दगी का जश्न मनाओ. किसी भी बीमारी या उलझन से आप गुजर रहे हों फिर भी ज़िन्दगी के हर पल का आनंद लें. उसे सेलिब्रेट करें. यही मुख्य बात है.

इसके लिए झारखण्ड के जमशेदपुर को चुनने की कोई खास वजह?

मुझे एक ऐसा शहर चुनना था जो मिजाज से कॉस्मोपोलिटन हो. वहां देश के हर सूबे के लोग काम करने आते हैं. वह बनाया हुआ शहर है. वहां किसी भी स्थानीय संस्कृति की छाप नहीं है. उस शहर की यह खूबसूरती मुझे भा रही थी. वहां हर सन्स्कृति के लोग हैं. मेरी फिल्म में भी अलग-अलग संस्कृति के लोग हैं. जमशेदपुर इस लिहाज से फिल्मों में अधिक नहीं आया है. वहां किसी भी मेट्रो शहर की सारी सुविधाएं हैं. मुझे एक छोटा शहर भी चाहिए था, जिनका विदेश (पेरिस) जाने का सपना स्वाभाविक लगे. वह गरीब शहर नहीं है. मैंने शूट भी ऐसा किया है कि वहां की खूबसूरती आये. फिल्म में एक उदासी भी है.

क्या पहली फिल्म ओरिजिनल नहीं होनी चाहिए थी? यह तो ‘द फौल्ट् इन आवर स्टार्स’ की रीमेक है. मूल फिल्म देख चुके दर्शक तुलना करेंगे?

मैंने इन बातों की चिंता नहीं की. अलग दिखने के लिए मैंने कोई कोशिश नहीं की. ओरिजिनल के चक्कर में नहीं रहा. मेरे लिए तो यह भी ओरीजनल है, क्योंकि मूल फिल्म भी मैंने बाद में देखी. हिंदी की स्क्रिप्ट मिली तो पढ़ने पर अच्छी लगी. शशांक ने बहुत अच्छी तरह भारत में उसे एडाप्ट किया है. मैंने पाया कि अपनी कहानी को जो मन कर रहा है, उस पर धयान देना चाहिए. अगर मौलिकता की बात सोचें तो वह दुर्लभ है. हर कहानी कहीं न कहीं से प्रेरित होती है.

शशांक खेतान का योगदान कैसा रहा?

मुझे लगता है कि आज शशांक ने बहुत अच्छा लिखा है. अभी सोशल मीडिया पर फिल्म की जो पंक्तियां चल रही हैं, उन्हें शशांक ने ही लिखा है. इन पंक्तियों की वजह से दर्शकों का कनेक्ट बन रहा है. बहुत कम ऐसे लेखक मिलेंगे, जो निर्देशक होने के बावजूद दूसरों की स्क्रिप्ट पर काम करते हैं. शशांक ने सफल फ़िल्में बनायीं हैं. स्क्रिप्ट की अच्छी समझ रखता है.

संजना संघी को नायिका के रूप में चुनने की उसकी कौन सी खासियत पर ध्यान रहा?

उसके साथ मैंने इम्तियाज़ अली की ‘रॉकस्टार’ की थी. उम्र बढ़ने के साथ उसके चेहरे की मासूमियत बढ़ रही थी. स्क्रिप्ट पढ़ते समय ही उसका मासूम छेहरा मेरी नज़रों में घूम गया था. किरदार के हिसाब से उसकी कास्टिंग बहुत रियल है. दर्शकों को उससे प्यार हो जायेगा. मुझे किसी दूसरे का ख्याल ही नहीं आया. अपनी फिल्म की कास्टिंग में तो गलत नहीं जा सकता हूं. संजना को देख कर लगता है कि उसे प्रोटेक्ट करना चाहिए. उसका ध्यान रखना चाहिए.

और सुशांत सिंह राजपूत तो पहले से तय रहे होंगे?

सुशांत ने बहुत पहले वादा किया था कि मेरी पहली फिल्म में वह रहेगा. उसने अपना वादा निभाया. फिल्म लेकर जब उसके पास गया तो उसने बगैर स्क्रिप्ट पढ़े हां कर दिया. मैंने कहा भी कि एक बार पढ़ लो. उसने पलट कर कहा कि आप की फिल्म की स्क्रिप्ट क्यों पढूंगा मैं? उसने शूट करते समय जमशेदपुर में स्क्रिप्ट पढ़ी. उसका प्यार और विश्वास था. उसने निभाया उसे. उसके मन में था कि मैं ही उसे पहली फिल्म ‘काय पो छे’ में लेकर आया था. मेरी पहली फिल्म करने की बात उसने 2016 में ही बोल दी थी. फिल्म इंडस्ट्री में तो रिश्ते बदलते रहते हैं. लोग वादे भूल जाते हैं.

अभी स्थितियां बिलकुल अलग हैं. आप कैसे संभाल रहे हो सब कुछ?

मैंने कल्पना नहीं की थी. मैं अभी तक सदमे में हूं. किसने सोचा होगा कि ऐसा वक़्त आएगा कि मुझे अकेले सब करना होगा. उसके साथ फिल्म बनायी. उसके बगैर रिलीज़ होगी फिल्म. जो हुआ वह दुर्भाग्य है. मैं इधर रोज़ फिल्म का गाना या कोई सीन देख रहा हूं. उसकी मौजूदगी महसूस करता हूं. दायें-बायें देखता हूं तो वह नहीं होता. ‘ब्योमकेश बख्शी’ और ‘सोनचिड़िया’ में उसने गंभीर किरदार किये थे. मेरा मन था कि उसे चार्मिंग, यंग और वायब्रेंट रोल में पेश करूं. मैंने उसे बहुत खुशमिजाज और चुलबुले किरदार के रूप में पेश किया है. उसने अपने आईडिया से उसे बढ़ाया. मेरे साथ मेहनत की. परफॉरमेंस के अंदाज में भी नवीनता मिलेगी. संवाद अदायगी में भी बदलाव किया है.

आपकी कौन सी खासियत इस फिल्म में भी दिखेगी?

मैं जिन फिल्मों की कास्टिंग करता हूं. उनमें कलाकारों के साथ वर्कशॉप करता हूं. यह फिल्म मेरी है. इसमें सुशांत मंझा हुआ है. (मैं सुशांत के लिए ‘था’ इस्तेमाल नहीं कर पाऊंगा.) संजना नयी थी. दोनों का मेल ज़रूरी था. एक स्तर पर लाना ज़रूरी है.

एक्टर सुशांत सिंह राजपूत में कैसी ग्रोथ हुई?

एक्टर तो वह पहले से बढ़िया रहा है. अभी उसका करैक्टर स्टडी और गहरा हो गया था. वह किरदारों के विज्ञान और मनोविज्ञान को पढ़ता है. वह पढ़ा-लिखा एक्टर है. बहुत ज़हीन है. वह अपने किरदार का पूरा खांका दिमाग में रखता है. ऐसी इमोशनल फिल्म में कैरेक्टर ग्राफ का पूरा ख्याल रखना पड़ता है कि पांच सीन पहले मन में क्या चल रहा था. बाद में क्या होने वाला है. मैंने उसके प्रोसेस को पहली फिल्म से देखा है. ‘काय पो छे’ के समय दो महीने का वर्कशॉप मैंने ही किया था. उसने खुद पर बहुत मेहनत की है. अभी उसके लिए कोई भी करदार मुश्किल नहीं है.

सुशांत सिंह राजपूत की भरपायी नहीं हो सकती. उनकी कमी को कैसे पूरी करोगे?

मैं और टैलेंट ले आऊंगा. अभी मैंने दिल्ली और चंडीगढ़ में ऑफिस खोला है. पांच और राज्यों में खोलूंगा सुशांत की याद में. फिल्म इंडस्ट्री में और सुशांत आएं.

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