फिल्म लॉन्ड्री: दर्शक और फिल्में कम, बंद होते सिनेमाघर

दर्शकों की इस नगण्य मौजूदगी से सिनेमाघरों का धंधा किस कदर चौपट हुआ है? फिलहाल दर्शकों के बढ़ने की कोई संभावना नहीं दिख रही है.

फिल्म लॉन्ड्री: दर्शक और फिल्में कम, बंद होते सिनेमाघर
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शुक्रवार 4 दिसंबर को क्रिस्टोफर नोलन की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टेनेट’ भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज हुई. क्रिस्टोफर नोलन ने अमेरिका समेत अन्य देशों में कुछ महीने पहले अपनी फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज की थी. वे भारत में सिनेमाघरों के खुलने का इंतजार कर रहे थे. वे फिल्मों को सिनेमाघर में प्रदर्शन के हिमायती हैं. वे डिजिटल तकनीक से खुद को दूर रखते हैं. उनके ख्याल से फ़िल्में डिजिटल माध्यम में अपनी मौलिक गुणवत्ता और प्रभाव खो देती हैं. रंग, दृश्य और बाकी प्रभावों का स्तर भी नीचे आ जाता है. पुणे में यही वजह है कि वह आज भी एनालॉग पद्धति में यकीन करते हुए फिल्म पर ही शूट करते हैं और चाहते हैं कि उनकी फिल्में सिनेमाघरों में ही प्रदर्शित हों.

तकनीक के प्रति उनके आग्रह और जिद का सम्मान करते हुए इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कोरोना काल की विषम परिस्थिति में उनकी फिल्म के दर्शक घट गए हैं और कारोबार में भी घाटा हुआ है. मुंबई के अंधेरी स्थित एक मल्टीप्लेक्स में इस फिल्म के शो के लिए 5 दिसम्बर शनिवार को सिर्फ आठ दर्शक हाजिर हो पाए. फिल्म चली, लेकिन हम-आप अनुमान कर सकते हैं कि दर्शकों की इस नगण्य मौजूदगी से सिनेमाघरों का धंधा किस कदर चौपट हुआ है? फिलहाल दर्शकों के बढ़ने की कोई संभावना नहीं दिख रही है.

दर्शक कोरोना काल में बाजार और सार्वजानिक स्थलों की गतिविधियां सामान्य होने पर भी दर्शक सिनेमाघरों का रुख नहीं कर रहे हैं. भारत सरकार की अधिसूचना के बाद देर-सबेर देश भर के सिनेमाघर खुले, लेकिन उनमें फिल्मों का टोटा है. नई फिल्में और लोकप्रिय सितारों की फिल्में प्रदर्शित नहीं हो रही है. आज के दर्शक ‘रीरन’ में आ रही फिल्मों के प्रति कतई उत्सुक नहीं हैं. सिनेमाघर खाली पड़े हैं. इसके अलावा दर्शकों के नहीं आने की आशंका में अनेक सिनेमाघर खुले ही नहीं हैं. कुछ खुले और फिर से बंद हो गए. प्रति शो आठ से 28 दर्शकों के लिए फिल्म चलाना पूरी तरह से घाटे का सौदा है. इस साल मार्च के तीसरे हफ्ते में कोरोंना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए सिनेमाघर बंद हुए. तब से उनका कारोबार तालाबंदी और उसके बाद के महीनों में ठप रहा. सात महीनों के बाद 15 अक्टूबर को सिनेमाघर खुले तो महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में तुरंत सिनेमाघर खोलने की जल्दबाजी नहीं थी. सिनेमाघरों के मालिक कारोबार की संभावना और अपना खर्च तौल रहे थे. महाराष्ट्र में सिनेमाघर मालिकों ने दबाव में आकर नवम्बर महीने में कारोबार चालू तो कर दिए. लेकिन दर्शकों ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. सिनेमाघरों द्वारा मानक संचालन प्रक्रिया का पालन करने पर भी दर्शक सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. साथ ही रिलीज हुई फिल्मों में लोकप्रिय सितारों के ना होने से भी उनका उत्साह ठंडा रहा. पिछले महीने प्रदर्शित हुई ‘सर’ और ‘सूरज पे मंगल भारी’ को दर्शक नहीं मिले. हां, उन्हें तालाबंदी के बाद रिलीज हुई पहली फिल्मों का तमगा जरूर मिल गया.

निकट भविष्य में इस स्थिति में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है. हालांकि प्रधानमंत्री और सरकारी एजेंसियों के दावे के मुताबिक अगले कुछ हफ्तों में वैक्सीन आ जाने की बात की जा रही है. फिर भी आम दर्शक आश्वस्त नहीं हैं. सभी नागरिकों तक वैक्सीन पहुंचने और उसका असर दिखने में वक्त लगेगा. इस बीच खबर आई है कि हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री को कोविड-19 का ट्रायल वैक्सीन लेने के बावजूद कोरोना हो गया. ऐसी खबरों के प्रसार के बाद आशंकाएं और घनी हो जाती हैं. सिनेमाघरों को दर्शकों और फिल्म दोनों की कमी का एहसास है. वे देख रहे हैं कि बाजार के दूसरे कारोबारों की तरह फिल्मों का कारोबार गति नहीं पकड़ पा रहा है.

लंबी तालाबंदी में अनेक सिनेमाघर के मालिकों ने फिर से बिजनेस आरंभ करने में रुचि नहीं दिखाई है. खासकर सिंगल स्क्रीन के मालिक धंधे की बिगड़ती हालत को देखते हुए और ज्यादा घाटा उठाने की स्थिति में नहीं हैं. उन्हें सिनेमाघरों के बंद रखने और स्थायी रूप से बंद कर देने में ही अपनी भलाई दिख रही है. पिछले दिनों हैदराबाद में पांच सिनेमाघरों ने स्थायी बंदी की घोषणा कर दी. ये सभी सिंगल स्क्रीन थे. उत्तर भारत के हिंदी प्रदेशों से भी ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं. अनेक सिनेमाघर या तो बंद हो चुके हैं या बंद हो जाएंगे. हिंदी फिल्मों पर आश्रित सिनेमाघरों की बुरी स्थिति है. एक तो दर्शक नहीं हैं और दूसरे फिल्में आ नहीं रही हैं. इस हफ्ते और आने वाले हफ्तों में रिलीज हो रही फिल्मों में स्टार आकर्षण भी नहीं है. ‘टेनेट’ के बाद हॉलीवुड की ‘वंडर वूमैन 1984’ आ रही है. हिंदी में कियारा आडवाणी की फिल्म ‘इंदु की जवानी’ 11 दिसंबर को रिलीज हो रही है. यह अपेक्षाकृत छोटी फिल्म है. क्रिसमस के मौके पर रिलीज हो रही ‘कुली नं. 1’ सीधे ओटीटी पर आएगी. बाद के हफ्तों में ‘तुलसीदास जूनियर’ ‘ट्यूजडेज एंड फ्राइडेज’, मैडम चीफ मिनिस्टर, हुडदंग, सायना, टाइम टू डांस और कोई जाने ना रिलीज होंगी.

‘सूर्यवंशी’ और ‘83’ की रिलीज की फिलहाल कोई तारीख तय नहीं है. फिल्म ट्रेड के जानकारों के मुताबिक दोनों फिल्में अब गर्मियों के मौसम में ही रिलीज हो पाएंगी. लगभग साल-सवा साल की देरी से रिलीज़ हो रही इन फिल्मों के निर्माताओं को अब नया डर सता रहा है. नई स्थिति में यह अनुमान किया जा रहा है कि अगले कुछ महीनों में लगभग 2000 सिनेमाघर बंद हो जाएंगे. इनमें अधिक संख्या सिंगल स्क्रीन की होगी. दोनों बड़ी फिल्में मल्टीप्लेक्स के साथ ही सिंगल स्क्रीन के कारोबार पर निर्भर करती हैं. व्यापक रिलीज की उम्मीद में ही वे प्रदर्शन की तारीखें टालते जा रहे हैं, लेकिन उनकी रिलीज के समय तक अगर 2,000 सिनेमाघर बंद हो जाएंगे तो फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर सीधा असर पड़ेगा. फिक्की के सर्वेक्षण के मुताबिक अभी देश में कुल 9527 सिनेमाघर हैं. इनमें से 3200 मल्टीप्लेक्स हैं और शेष 6327 सिंगल स्क्रीन थिएटर है. मल्टीप्लेक्स तो बंद नहीं होंगे. सिंगल स्क्रीन पर ही आफत आई है.

राज्य सरकारों की तरफ से सिनेमाघरों के मालिकों को कोई राहत नहीं मिल रही है. दूसरे कारोबारों में छूट और सब्सिडी दी जा रही है, लेकिन सिनेमाघरों की तरफ सरकारों का ध्यान नहीं है. कोरोना काल ने फिल्म कारोबार को भारी नुकसान पहुंचाया है. इस बीच ओटीपी के आ जाने से दर्शकों को घर बैठे फिल्म देखने की नई लत लग गई है. वहां छोटी-बड़ी फ़िल्में भी आ रही हैं. यह समय और पैसा दोनों के हिसाब से किफायती और सुविधाजनक है. ऊपर से कोविड-19 संक्रमण का खतरा अभी टला नहीं है. हर तरफ यही घोषणा होती रहती है कि कोरोना अभी गया नहीं है. स्वयं प्रधानमंत्री बार-बार यही दोहरा रहे हैं. ऐसे में दर्शकों का रवैया भी सिनेमाघरों को लेकर कोई उम्मीद नहीं जगाता है.

दरअसल, दर्शक सिनेमाघरों के बंद कक्षों में दो घंटों के लिए बैठने को तैयार नहीं हैं. पहले आई तमाम रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी जगहों पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. शॉपिंग मॉल और अन्य सार्वजानिक स्थलों में एक खुलापन रहता है और दूसरे वहां ग्राहकों को घंटे-दो घंटे बिताने की मजबूरी नहीं रहती. वे खुद के प्रति चौकस रह सकते हैं. असुविधा महसूस होने पर तुरंत वहां से निकल सकते हैं. सिनेमाघरों में यह मुमकिन नहीं है.

निश्चित ही फिल्मों के प्रदर्शन, दर्शकों की मौजूदगी और फिल्म कारोबार को पटरी पर आने में समय लगेगा. कोविड-19 का खतरा टलने और स्थिति व माहौल पूरी तरह सामान्य होने के बाद ही सब कुछ ठीक हो पाएगा. तब तक फिल्मों के कारोबारी टिक पाएंगे क्या? संकेत आशाजनक नहीं हैं.

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शुक्रवार 4 दिसंबर को क्रिस्टोफर नोलन की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘टेनेट’ भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज हुई. क्रिस्टोफर नोलन ने अमेरिका समेत अन्य देशों में कुछ महीने पहले अपनी फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज की थी. वे भारत में सिनेमाघरों के खुलने का इंतजार कर रहे थे. वे फिल्मों को सिनेमाघर में प्रदर्शन के हिमायती हैं. वे डिजिटल तकनीक से खुद को दूर रखते हैं. उनके ख्याल से फ़िल्में डिजिटल माध्यम में अपनी मौलिक गुणवत्ता और प्रभाव खो देती हैं. रंग, दृश्य और बाकी प्रभावों का स्तर भी नीचे आ जाता है. पुणे में यही वजह है कि वह आज भी एनालॉग पद्धति में यकीन करते हुए फिल्म पर ही शूट करते हैं और चाहते हैं कि उनकी फिल्में सिनेमाघरों में ही प्रदर्शित हों.

तकनीक के प्रति उनके आग्रह और जिद का सम्मान करते हुए इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि कोरोना काल की विषम परिस्थिति में उनकी फिल्म के दर्शक घट गए हैं और कारोबार में भी घाटा हुआ है. मुंबई के अंधेरी स्थित एक मल्टीप्लेक्स में इस फिल्म के शो के लिए 5 दिसम्बर शनिवार को सिर्फ आठ दर्शक हाजिर हो पाए. फिल्म चली, लेकिन हम-आप अनुमान कर सकते हैं कि दर्शकों की इस नगण्य मौजूदगी से सिनेमाघरों का धंधा किस कदर चौपट हुआ है? फिलहाल दर्शकों के बढ़ने की कोई संभावना नहीं दिख रही है.

दर्शक कोरोना काल में बाजार और सार्वजानिक स्थलों की गतिविधियां सामान्य होने पर भी दर्शक सिनेमाघरों का रुख नहीं कर रहे हैं. भारत सरकार की अधिसूचना के बाद देर-सबेर देश भर के सिनेमाघर खुले, लेकिन उनमें फिल्मों का टोटा है. नई फिल्में और लोकप्रिय सितारों की फिल्में प्रदर्शित नहीं हो रही है. आज के दर्शक ‘रीरन’ में आ रही फिल्मों के प्रति कतई उत्सुक नहीं हैं. सिनेमाघर खाली पड़े हैं. इसके अलावा दर्शकों के नहीं आने की आशंका में अनेक सिनेमाघर खुले ही नहीं हैं. कुछ खुले और फिर से बंद हो गए. प्रति शो आठ से 28 दर्शकों के लिए फिल्म चलाना पूरी तरह से घाटे का सौदा है. इस साल मार्च के तीसरे हफ्ते में कोरोंना के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए सिनेमाघर बंद हुए. तब से उनका कारोबार तालाबंदी और उसके बाद के महीनों में ठप रहा. सात महीनों के बाद 15 अक्टूबर को सिनेमाघर खुले तो महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में तुरंत सिनेमाघर खोलने की जल्दबाजी नहीं थी. सिनेमाघरों के मालिक कारोबार की संभावना और अपना खर्च तौल रहे थे. महाराष्ट्र में सिनेमाघर मालिकों ने दबाव में आकर नवम्बर महीने में कारोबार चालू तो कर दिए. लेकिन दर्शकों ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई. सिनेमाघरों द्वारा मानक संचालन प्रक्रिया का पालन करने पर भी दर्शक सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. साथ ही रिलीज हुई फिल्मों में लोकप्रिय सितारों के ना होने से भी उनका उत्साह ठंडा रहा. पिछले महीने प्रदर्शित हुई ‘सर’ और ‘सूरज पे मंगल भारी’ को दर्शक नहीं मिले. हां, उन्हें तालाबंदी के बाद रिलीज हुई पहली फिल्मों का तमगा जरूर मिल गया.

निकट भविष्य में इस स्थिति में सुधार की गुंजाइश नहीं दिख रही है. हालांकि प्रधानमंत्री और सरकारी एजेंसियों के दावे के मुताबिक अगले कुछ हफ्तों में वैक्सीन आ जाने की बात की जा रही है. फिर भी आम दर्शक आश्वस्त नहीं हैं. सभी नागरिकों तक वैक्सीन पहुंचने और उसका असर दिखने में वक्त लगेगा. इस बीच खबर आई है कि हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री को कोविड-19 का ट्रायल वैक्सीन लेने के बावजूद कोरोना हो गया. ऐसी खबरों के प्रसार के बाद आशंकाएं और घनी हो जाती हैं. सिनेमाघरों को दर्शकों और फिल्म दोनों की कमी का एहसास है. वे देख रहे हैं कि बाजार के दूसरे कारोबारों की तरह फिल्मों का कारोबार गति नहीं पकड़ पा रहा है.

लंबी तालाबंदी में अनेक सिनेमाघर के मालिकों ने फिर से बिजनेस आरंभ करने में रुचि नहीं दिखाई है. खासकर सिंगल स्क्रीन के मालिक धंधे की बिगड़ती हालत को देखते हुए और ज्यादा घाटा उठाने की स्थिति में नहीं हैं. उन्हें सिनेमाघरों के बंद रखने और स्थायी रूप से बंद कर देने में ही अपनी भलाई दिख रही है. पिछले दिनों हैदराबाद में पांच सिनेमाघरों ने स्थायी बंदी की घोषणा कर दी. ये सभी सिंगल स्क्रीन थे. उत्तर भारत के हिंदी प्रदेशों से भी ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं. अनेक सिनेमाघर या तो बंद हो चुके हैं या बंद हो जाएंगे. हिंदी फिल्मों पर आश्रित सिनेमाघरों की बुरी स्थिति है. एक तो दर्शक नहीं हैं और दूसरे फिल्में आ नहीं रही हैं. इस हफ्ते और आने वाले हफ्तों में रिलीज हो रही फिल्मों में स्टार आकर्षण भी नहीं है. ‘टेनेट’ के बाद हॉलीवुड की ‘वंडर वूमैन 1984’ आ रही है. हिंदी में कियारा आडवाणी की फिल्म ‘इंदु की जवानी’ 11 दिसंबर को रिलीज हो रही है. यह अपेक्षाकृत छोटी फिल्म है. क्रिसमस के मौके पर रिलीज हो रही ‘कुली नं. 1’ सीधे ओटीटी पर आएगी. बाद के हफ्तों में ‘तुलसीदास जूनियर’ ‘ट्यूजडेज एंड फ्राइडेज’, मैडम चीफ मिनिस्टर, हुडदंग, सायना, टाइम टू डांस और कोई जाने ना रिलीज होंगी.

‘सूर्यवंशी’ और ‘83’ की रिलीज की फिलहाल कोई तारीख तय नहीं है. फिल्म ट्रेड के जानकारों के मुताबिक दोनों फिल्में अब गर्मियों के मौसम में ही रिलीज हो पाएंगी. लगभग साल-सवा साल की देरी से रिलीज़ हो रही इन फिल्मों के निर्माताओं को अब नया डर सता रहा है. नई स्थिति में यह अनुमान किया जा रहा है कि अगले कुछ महीनों में लगभग 2000 सिनेमाघर बंद हो जाएंगे. इनमें अधिक संख्या सिंगल स्क्रीन की होगी. दोनों बड़ी फिल्में मल्टीप्लेक्स के साथ ही सिंगल स्क्रीन के कारोबार पर निर्भर करती हैं. व्यापक रिलीज की उम्मीद में ही वे प्रदर्शन की तारीखें टालते जा रहे हैं, लेकिन उनकी रिलीज के समय तक अगर 2,000 सिनेमाघर बंद हो जाएंगे तो फिल्म के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन पर सीधा असर पड़ेगा. फिक्की के सर्वेक्षण के मुताबिक अभी देश में कुल 9527 सिनेमाघर हैं. इनमें से 3200 मल्टीप्लेक्स हैं और शेष 6327 सिंगल स्क्रीन थिएटर है. मल्टीप्लेक्स तो बंद नहीं होंगे. सिंगल स्क्रीन पर ही आफत आई है.

राज्य सरकारों की तरफ से सिनेमाघरों के मालिकों को कोई राहत नहीं मिल रही है. दूसरे कारोबारों में छूट और सब्सिडी दी जा रही है, लेकिन सिनेमाघरों की तरफ सरकारों का ध्यान नहीं है. कोरोना काल ने फिल्म कारोबार को भारी नुकसान पहुंचाया है. इस बीच ओटीपी के आ जाने से दर्शकों को घर बैठे फिल्म देखने की नई लत लग गई है. वहां छोटी-बड़ी फ़िल्में भी आ रही हैं. यह समय और पैसा दोनों के हिसाब से किफायती और सुविधाजनक है. ऊपर से कोविड-19 संक्रमण का खतरा अभी टला नहीं है. हर तरफ यही घोषणा होती रहती है कि कोरोना अभी गया नहीं है. स्वयं प्रधानमंत्री बार-बार यही दोहरा रहे हैं. ऐसे में दर्शकों का रवैया भी सिनेमाघरों को लेकर कोई उम्मीद नहीं जगाता है.

दरअसल, दर्शक सिनेमाघरों के बंद कक्षों में दो घंटों के लिए बैठने को तैयार नहीं हैं. पहले आई तमाम रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी जगहों पर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. शॉपिंग मॉल और अन्य सार्वजानिक स्थलों में एक खुलापन रहता है और दूसरे वहां ग्राहकों को घंटे-दो घंटे बिताने की मजबूरी नहीं रहती. वे खुद के प्रति चौकस रह सकते हैं. असुविधा महसूस होने पर तुरंत वहां से निकल सकते हैं. सिनेमाघरों में यह मुमकिन नहीं है.

निश्चित ही फिल्मों के प्रदर्शन, दर्शकों की मौजूदगी और फिल्म कारोबार को पटरी पर आने में समय लगेगा. कोविड-19 का खतरा टलने और स्थिति व माहौल पूरी तरह सामान्य होने के बाद ही सब कुछ ठीक हो पाएगा. तब तक फिल्मों के कारोबारी टिक पाएंगे क्या? संकेत आशाजनक नहीं हैं.

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