टीआरपी घोटाला: बार्क कैसे डेटा की हेरा-फेरी में रहस्यमय बनी हुई है

जैसे-जैसे टीआरपी पर घोटाले की जांच बढ़ रही है, क्या बार्क कुछ पुराने कर्मचारियों की बलि देने को तैयार है?

WrittenBy:एंटो टी जोसेफ
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टीआरएआई के नए नियम

सुनील लुल्ला के जिम्मेदारी संभालने के कुछ महीनों बाद, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण ने बार्क के अंदर पारदर्शिता को लेकर कुछ शंकाएं उठाई थीं. प्राधिकरण ने अपने सुझावों में कहा था कि बार्क भारत इंडिया के बोर्ड में कम से कम 50 प्रतिशत स्वतंत्र सदस्य होने चाहिए, जिनमें एक मापने की तकनीक के विशेषज्ञ भी हो, भारत की उच्च संस्थाओं में से एक राष्ट्रीय ख्याति वाला सांख्यिकीविद् हो और दो प्रतिनिधि सरकार या विनियामक संस्था के हों.

उन्होंने यह भी कहा कि पुनर्निर्माण बोर्ड को उद्योग जगत से आने वाली तीनों निर्मात्री संस्थानों (इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन की 60 प्रतिशत और एडवरटाइजिंग एजेंसी एसोसिएशन ऑफ इंडिया व इंडियन सोसायटी ऑफ एडवरटाइजर्स की 20-20 प्रतिशत हिस्सेदारी) को बराबर प्रतिनिधित्व देना चाहिए जिसमें उनके वोटिंग के अधिकार बराबर हों, भले ही उनके स्वामित्व का अनुपात कितना भी छोटा या बड़ा हो.

अंदर के उस व्यक्ति के अनुसार, "बार्क ने टीआरएआई की सिफारिशों के अनुसार अभी तक अपने बोर्ड का पुनर्गठन नहीं किया है. वह अभी भी 4:2:2 के अनुपात में है, जिससे प्रसारक अपने चार सदस्यों के वजह से सारे निर्णय ले रहा है."

वर्तमान में बोर्ड के आठ सदस्य हैं. चेयरमैन पुनीत गोयनका के अलावा, प्रसारकों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन और लोग, स्टार और डिजनी इंडिया के कार्यकारी निदेशक के माधवन, प्रसार भारती के सीईओ शशि एस वेमपति और इंडिया टुडे ग्रुप के वॉइस चेयरमैन कली पुरी हैं. बोर्ड के और सदस्य गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड के व्यापार प्रमुख सुनील कटारिया, प्रोक्टर एंड गैंबल के पूर्व सीईओ भरत विट्ठलभाई पटेल, दक्षिण एशिया डेंटसू एजिस नेटवर्क के चेयरमैन और सीईओ आशीष भसीन और मल्टी स्क्रीन मीडिया के सीईओ एनपी सिंह हैं.

एक बार लागू होने के बाद, टीआरएआई की सिफारिशों का मतलब होगा कि, प्रसारक बोर्ड में अपनी सीटें और प्रशासनिक संस्था में अपनी नियंत्रक शक्ति, बार्क में 60 प्रतिशत स्वामित्व होते हुए भी खो देंगे.

उपरोक्त वक्तव्य देने वाले बोर्ड मेंबर कहते हैं, "प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर वेम्पती की अध्यक्षता वाली कमेटी इन सिफारिशों और कंपनी के सुझावों को देख रही है."

उद्योग के कुछ अधिकारियों ने इस पत्रकार को बताया कि उनकी राय में यह सारा विवाद संभवत: "टीआरएआई के दखल" से ध्यान हटाने के लिए किया गया एक प्रयास भी हो सकता है.

समाचारों की टीआरपी

परंतु सत्य यह है कि इस सारे घपले के मामले में अपनी भूमिका समझाना बार्क के लिए मुश्किल हो रहा है. विज्ञापन दाताओं के हजारों करोड़ रुपयों की जिम्मेदारी बार्क के कंधों पर है.

क्या टीवी के समाचार चैनलों के लिए, जीआरपी या टीआरपी इतनी जरूरी हैं? जीआरपी केवल एक गणित का समीकरण है जिसका इस्तेमाल मीडिया योजनाकार और खरीदने वाले केवल कितने दर्शकों ने उनका विज्ञापन देखा यह जानने के लिए इस्तेमाल करते हैं. टीआरपी, जीआरपी का और सटीक निष्कर्ष है. जहां जीआरपी का अर्थ विज्ञापन कितने लोगों को प्रदर्शित हुआ इसका कुल जमा है, वहीं टीआरपी परिलक्षित दर्शकों को हुए प्रदर्शन को इंगित करती हैं.

मीडिया के खरीदार इस घोटाले के फैलाव को ध्यान से देख रहे हैं और अपने मीडिया पर होने वाले खर्च का भी दोबारा से हिसाब लगा रहे हैं. अधिकतर कंपनियों ने अपना खर्च इस विवाद को राजनीति से प्रेरित समझकर जारी रखा, जब तक उनके सामने और गिरफ्तारियां और सबूत नहीं आ गए.

हालांकि, अमेरिका मीडिया मार्केटिंग दिग्गज के एक वरिष्ठ मीडिया में खरीदारी करने वाले अधिकारी ने इसे कम आंकने की कोशिश की, "भारत में, जीईसी अर्थात सामान्य मनोरंजन के चैनल, जीआरपी से निर्धारित होते हैं परंतु समाचार चैनल नहीं. अधिकतर विज्ञापनदाता विज्ञापनों पर अपने कुल जमा खर्च का केवल पांच से दस प्रतिशत ही समाचार चैनलों पर खर्च कर रहे हैं. यह जारी रहेगा. बार्क विवाद ने कोई बड़ा परिवर्तन नहीं लाया है."

खर्च के हिसाब से, समाचार और जीईसी, इन दोनों के बीच कोई मुकाबला नहीं है. वे बताते हैं: "मसलन, जीईसी में 20 स्पॉट समाचार चैनलों के करीब 2000 स्पाट के बराबर होंगे."

मीडिया में खरीदारी करने वाले अधिकारियों के अनुसार कोविड-19 समय में, कार्यक्रम के तौर पर समाचारों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है. ऐसे ही एक अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया, "अधिकतर विज्ञापनदाता समाचार चैनलों में मौजूद रहना चाहते हैं."

अब बार्क को परेशान पुलिस क्या यह तर्क कर रहा है कि डाटा में हेराफेरी केवल समाचार चैनलों तक ही सीमित नहीं थी. पुलिस का कहना है कि "जीईसी डेटा में भी ऐसी ही हेरा फेरी के सबूत हैं."

मुंबई पुलिस के अनुसार एक चैनल, जिस के सीईओ ने हाल ही में अपना पद छोड़ा, भी इस गड़बड़ी में शामिल था.

जैसे-जैसे जांच का दायरा फैल रहा है, रिपब्लिक टीवी अपनी कर्कश आवाज को थोड़ा कम करता हुआ सा प्रतीत होता है. यह चैनल जब तक राष्ट्रवाद पर फैला है यह दावा कर रहा है कि रिपब्लिक "एक आदमी नहीं, जनता की संयुक्त शक्ति है." इस विवाद के बाद, क्या वह फिर से आगे निकल जाएगा और जनता की संयुक्त शक्ति दिखाएगा?

इस सवाल का जवाब मुंबई पुलिस हमें जल्द ही दे देगी.

टीआरएआई के नए नियम

सुनील लुल्ला के जिम्मेदारी संभालने के कुछ महीनों बाद, भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण ने बार्क के अंदर पारदर्शिता को लेकर कुछ शंकाएं उठाई थीं. प्राधिकरण ने अपने सुझावों में कहा था कि बार्क भारत इंडिया के बोर्ड में कम से कम 50 प्रतिशत स्वतंत्र सदस्य होने चाहिए, जिनमें एक मापने की तकनीक के विशेषज्ञ भी हो, भारत की उच्च संस्थाओं में से एक राष्ट्रीय ख्याति वाला सांख्यिकीविद् हो और दो प्रतिनिधि सरकार या विनियामक संस्था के हों.

उन्होंने यह भी कहा कि पुनर्निर्माण बोर्ड को उद्योग जगत से आने वाली तीनों निर्मात्री संस्थानों (इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन की 60 प्रतिशत और एडवरटाइजिंग एजेंसी एसोसिएशन ऑफ इंडिया व इंडियन सोसायटी ऑफ एडवरटाइजर्स की 20-20 प्रतिशत हिस्सेदारी) को बराबर प्रतिनिधित्व देना चाहिए जिसमें उनके वोटिंग के अधिकार बराबर हों, भले ही उनके स्वामित्व का अनुपात कितना भी छोटा या बड़ा हो.

अंदर के उस व्यक्ति के अनुसार, "बार्क ने टीआरएआई की सिफारिशों के अनुसार अभी तक अपने बोर्ड का पुनर्गठन नहीं किया है. वह अभी भी 4:2:2 के अनुपात में है, जिससे प्रसारक अपने चार सदस्यों के वजह से सारे निर्णय ले रहा है."

वर्तमान में बोर्ड के आठ सदस्य हैं. चेयरमैन पुनीत गोयनका के अलावा, प्रसारकों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन और लोग, स्टार और डिजनी इंडिया के कार्यकारी निदेशक के माधवन, प्रसार भारती के सीईओ शशि एस वेमपति और इंडिया टुडे ग्रुप के वॉइस चेयरमैन कली पुरी हैं. बोर्ड के और सदस्य गोदरेज कंज्यूमर प्रोडक्ट्स लिमिटेड के व्यापार प्रमुख सुनील कटारिया, प्रोक्टर एंड गैंबल के पूर्व सीईओ भरत विट्ठलभाई पटेल, दक्षिण एशिया डेंटसू एजिस नेटवर्क के चेयरमैन और सीईओ आशीष भसीन और मल्टी स्क्रीन मीडिया के सीईओ एनपी सिंह हैं.

एक बार लागू होने के बाद, टीआरएआई की सिफारिशों का मतलब होगा कि, प्रसारक बोर्ड में अपनी सीटें और प्रशासनिक संस्था में अपनी नियंत्रक शक्ति, बार्क में 60 प्रतिशत स्वामित्व होते हुए भी खो देंगे.

उपरोक्त वक्तव्य देने वाले बोर्ड मेंबर कहते हैं, "प्रसार भारती के सीईओ शशि शेखर वेम्पती की अध्यक्षता वाली कमेटी इन सिफारिशों और कंपनी के सुझावों को देख रही है."

उद्योग के कुछ अधिकारियों ने इस पत्रकार को बताया कि उनकी राय में यह सारा विवाद संभवत: "टीआरएआई के दखल" से ध्यान हटाने के लिए किया गया एक प्रयास भी हो सकता है.

समाचारों की टीआरपी

परंतु सत्य यह है कि इस सारे घपले के मामले में अपनी भूमिका समझाना बार्क के लिए मुश्किल हो रहा है. विज्ञापन दाताओं के हजारों करोड़ रुपयों की जिम्मेदारी बार्क के कंधों पर है.

क्या टीवी के समाचार चैनलों के लिए, जीआरपी या टीआरपी इतनी जरूरी हैं? जीआरपी केवल एक गणित का समीकरण है जिसका इस्तेमाल मीडिया योजनाकार और खरीदने वाले केवल कितने दर्शकों ने उनका विज्ञापन देखा यह जानने के लिए इस्तेमाल करते हैं. टीआरपी, जीआरपी का और सटीक निष्कर्ष है. जहां जीआरपी का अर्थ विज्ञापन कितने लोगों को प्रदर्शित हुआ इसका कुल जमा है, वहीं टीआरपी परिलक्षित दर्शकों को हुए प्रदर्शन को इंगित करती हैं.

मीडिया के खरीदार इस घोटाले के फैलाव को ध्यान से देख रहे हैं और अपने मीडिया पर होने वाले खर्च का भी दोबारा से हिसाब लगा रहे हैं. अधिकतर कंपनियों ने अपना खर्च इस विवाद को राजनीति से प्रेरित समझकर जारी रखा, जब तक उनके सामने और गिरफ्तारियां और सबूत नहीं आ गए.

हालांकि, अमेरिका मीडिया मार्केटिंग दिग्गज के एक वरिष्ठ मीडिया में खरीदारी करने वाले अधिकारी ने इसे कम आंकने की कोशिश की, "भारत में, जीईसी अर्थात सामान्य मनोरंजन के चैनल, जीआरपी से निर्धारित होते हैं परंतु समाचार चैनल नहीं. अधिकतर विज्ञापनदाता विज्ञापनों पर अपने कुल जमा खर्च का केवल पांच से दस प्रतिशत ही समाचार चैनलों पर खर्च कर रहे हैं. यह जारी रहेगा. बार्क विवाद ने कोई बड़ा परिवर्तन नहीं लाया है."

खर्च के हिसाब से, समाचार और जीईसी, इन दोनों के बीच कोई मुकाबला नहीं है. वे बताते हैं: "मसलन, जीईसी में 20 स्पॉट समाचार चैनलों के करीब 2000 स्पाट के बराबर होंगे."

मीडिया में खरीदारी करने वाले अधिकारियों के अनुसार कोविड-19 समय में, कार्यक्रम के तौर पर समाचारों को सबसे ज्यादा फायदा हुआ है. ऐसे ही एक अधिकारी ने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर बताया, "अधिकतर विज्ञापनदाता समाचार चैनलों में मौजूद रहना चाहते हैं."

अब बार्क को परेशान पुलिस क्या यह तर्क कर रहा है कि डाटा में हेराफेरी केवल समाचार चैनलों तक ही सीमित नहीं थी. पुलिस का कहना है कि "जीईसी डेटा में भी ऐसी ही हेरा फेरी के सबूत हैं."

मुंबई पुलिस के अनुसार एक चैनल, जिस के सीईओ ने हाल ही में अपना पद छोड़ा, भी इस गड़बड़ी में शामिल था.

जैसे-जैसे जांच का दायरा फैल रहा है, रिपब्लिक टीवी अपनी कर्कश आवाज को थोड़ा कम करता हुआ सा प्रतीत होता है. यह चैनल जब तक राष्ट्रवाद पर फैला है यह दावा कर रहा है कि रिपब्लिक "एक आदमी नहीं, जनता की संयुक्त शक्ति है." इस विवाद के बाद, क्या वह फिर से आगे निकल जाएगा और जनता की संयुक्त शक्ति दिखाएगा?

इस सवाल का जवाब मुंबई पुलिस हमें जल्द ही दे देगी.

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