ब्रह्मपुत्र: कैसे एक नदी असम में लोगों के जीवन और आजीविका को खत्म कर रही है

सालाना बाढ़ और ज़मीन का निरंतर कटान और इन दोनों ही से निपटने में प्रशासन की अक्षमता ने, पूरे जनसमूहों को हताशा में धकेल दिया है.

ब्रह्मपुत्र: कैसे एक नदी असम में लोगों के जीवन और आजीविका को खत्म कर रही है
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हर साल, घड़ी की सुईयों की तरह ही निश्चित समय पर, बढ़ती हुई ब्रह्मपुत्र से आई असम बाढ़ की तस्वीरें भारतीय मीडिया पर छा जाती हैं. हर साल, इस आपदा के बाद उठाए गए कदम केवल जान और माल को हुए नुकसान और खत्म हुई फसल और जीव-जंतुओं की गणना भर बन कर रह जाते हैं. कभी कभार प्रकृति का विनाश, आपदा का कारण और परिणाम बनकर भी बातचीत का हिस्सा बन जाता है. परंतु आम लोग जो इस आपदा को झेलते हैं उनकी बात शायद ही कभी होती है, होती भी है तो जल्द ही खबरों के चक्र में भुला दी जाती है. फिर नया साल आता है और फिर उसी कथानक का पटाक्षेप शुरू हो जाता है.

भारत में बाकी जगह भी कमोबेश ऐसा ही है. किसी आपदा से उपजी मानवीय वेदना के आर्थिक और प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़े कारणों को दोषारोपण करने के बाद विवाद और संख्यात्मक विश्लेषण पीछे छोड़ देते हैं.

इसी को सुधारने के प्रयास में न्यूजलॉन्ड्री ने साल 2020 की दो सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं- ब्रह्मपुत्र बाढ़ और अमफन चक्रवात- जिनमें कम से कम 221 जानें गईं, से आम लोगों के जीवन में आई तबाही को जानने के लिए असम और बंगाल की यात्रा की.

असम में जहां बाढ़ साल दर साल उन्हें हाशिए पर रहने वाले लोगों को तबाह कर देती है, हमने ब्रह्मपुत्र के तट पर करीब 1300 किलोमीटर कवर करते हुए, छह बाढ़ ग्रस्त जिलों और विश्व के सबसे बड़े नदी के टापू मजूली का दौरा किया. बंगाल में हमने सुंदरबन क्षेत्र में, अमफन से तबाह हुए मैंग्रोव डेल्टा अर्थात नदी के पाट पर बने हुए उष्णकटिबंधीय वृक्षों के झुरमुट पर ध्यान दिया.

उत्तर पूर्व के राज्य असम में आपदा की सबसे बुरी मार झेलने वाले लोगों की सबसे बड़ी समस्या जमीन का क्षरण और उसके कारण भूमिहीन बन जाना है.

असम ने 1950 से नदी के कारण होने वाले भूमि के क्षरण में 4270 वर्ग किलोमीटर ज़मीन और 2500 गांव खोए हैं. यह क्षेत्रफल में गोवा राज्य से ज्यादा भूमि है. राज्य के पर्यावरण विभाग की पांच वर्ष पुरानी ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार, खोई हुई भूमि में से कम से कम 3800 वर्ग किलोमीटर "अत्यधिक उपजाऊ खेती की जमीन" थी और रिपोर्ट ब्रह्मपुत्र के बहने के रास्ते में निरंतर बदलाव को आपदाओं का मुख्य कारण मानती है.

रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि "बाढ़ और भूमि के कटान के साथ जुड़ा नुकसान भी बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि इनके कारण विस्थापन भी हो रहा है. जिससे जमीन के ऊपर होने वाले टकराव भी बढ़ गए हैं और वे जनता के आर्थिक विकास के लिए खतरा बन सकते हैं.

लेकिन इसी वर्ष इस कटान को प्राकृतिक आपदा मानने के लिए जोर दिया जा रहा है. जिससे कि इससे प्रभावित जनसंख्या को राज्य से दी जाने वाली मुआवजे की रकम मिल सके. NENow की एक रिपोर्ट कहती है, "आपदा नुकसान मरम्मत योजना के अंतर्गत निर्धारित की गई राशि भूमि कटान के कारण प्रभावित हुए लोगों तक नहीं पहुंचती. यहां तक कि राज्य सरकार के पास, विस्थापित हुए लोगों का कोई लेखा-जोखा नहीं है, खास तौर पर निचले असम क्षेत्र में."

कटान ने कैसे आम लोगों के जीवन और जीवन यापन को तहस-नहस कर दिया है. इसको देखने के लिए अरुणाचल प्रदेश सीमा के निकट, धेमाजी जिले के करीब 90 परिवारों वाले हेसुली पठार गांव को देखें.

अरुणाचल हाईवे से 25 मिनट की दूरी पर बसे इस छोटे से गांव को 6 साल से भयानक बाढ़ तबाह कर दे रही है. तबाही हर तरफ क्षतिग्रस्त मकानों और रेतीले हो चुकी बंजर खेती की जमीन से दिखाई देती है. लोग जहां अपनी आजीविका के लिए प्राथमिक तौर पर खेती पर निर्भर हैं वहां खेतिहर भूमि का नुकसान, एक बहुत बड़ा झटका है.

34 वर्षीय रेखा गोगोई जो स्थानीय पंचायत की सदस्य भी हैं, खेतों के बीच से जा रहे एक धारा की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं, "आप यह नदी देख रहे हैं? यहीं मेरी ज़मीन हुआ करती थी." यह धारा, ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी जियाढाल नदी से, कुछ ही समय पहले निकली है. नदी के बहाव को अलग-अलग धाराओं में बंट जाने को नदी की 'ब्रेडिंग' कहा जाता है.

रेखा बताती हैं, "मेरे खेत का नामोनिशान तक नहीं बचा है. जियाढाल नदी की यह धार सब कुछ बहा कर ले गई. इसी साल यह हमारे गांव से होते हुए बह गई, मैं जब भी उधर देखती हूं तो अवसाद से भर जाती हूं. हमारे पास नदी के उस पार बहुत थोड़ी सी जमीन बची है पर उसमें जगह-जगह रेत आ गई हैं जिसमें कुछ नहीं उगता. यह सब हुए महीनों बीत गए हैं पर हम अभी भी इस से समझौता नहीं कर पाए हैं."

नदी की यह नई धारा केवल रेखा की खेती जमीन ही नहीं, बल्कि उसने उसके परिवार का भविष्य भी अंधकारमय कर दिया है. रेखा का कहना है, "हम इस ज़मीन पर पूरी तरह से निर्भर थे. हम अपने खाने के लिए भी उगाते और उसे बाजार में भी बेच देते. पर अब वह सब चला गया है और मैं नहीं जानती कि हम क्या करेंगे. मेरी एक 9 साल और एक 12 साल की बेटियां हैं, उन्हें पढ़ाना और बड़ा करना है. हमें उनके लिए कोई हल तो निकालना ही पड़ेगा."

नदी के दूसरी तरफ धान के खेत अभी पूरी तरह से रेतीले नहीं हुए तो अभी उनमें खेती की जा सकती है, लेकिन नदी के इस पाट पर खेती लायक जमीन बाढ़ के द्वारा बड़ी मात्रा में लाए रेत और गाद की वजह से कम से कम दो साल तो बंजर ही रहेगी.

एक समय था जब बाढ़ का आना अपने साथ कुछ अच्छा भी लेकर आता था. बाढ़ अपने पीछे उर्वरक गाद छोड़ जाती थी जिससे मिट्टी फिर से उपजाऊ हो जाती थी. परंतु अब आने वाली गाद अधिकतर रेत ही होती है जिसका एक बहुत बड़ा कारण पर्यावरण परिवर्तन है.

रेखा कहती हैं, "हमारे यहां पेड़ और खास तौर पर बांस के पेड़, सूखने शुरू हो गए हैं. हम उपयोग में आने वाला बास गांव में ही उगा लेते थे, पर अब हमें वह बाहर से खरीदना पड़ रहा है. हमारे पेड़ और फसल इस रेतीली भूमि से मेल नहीं खाते."

हेसुली गांव के लोगों की यह विकट परिस्थिति कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं है. कम से कम 4 सालों से यह लोग प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं कि जियाढाल नदी पर ऊपर बने पुश्ते या तटबंध की मरम्मत की जाए, पर कुछ हुआ नहीं. इस वर्ष नदी तटबंध को तोड़ते हुए बह गई और गांव को डुबोते हुए उसने एक नई धारा को जन्म दे दिया.

रेखा बताती हैं, "अगर तटबंध की मरम्मत कर दी जाए, तो वह इस क्षेत्र के 40 गांवों को हर साल बाढ़ग्रस्त होने से काफी हद तक बचा सकता है. इसके साथ ही साथ यह नहीं धारा भी मोड़ दी जाएगी तो मिट्टी भी कुछ वर्षों में दोबारा से उपजाऊ हो जाएगी, पर सरकार की तरफ से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है. हम इस डर में जीते हैं कि किसी भी दिन हमारा पूरा गांव बह सकता है."

असम में करीब ऐसे 423 तटबंधों का जाल पिछले छह दशकों में निर्मित किया गया है परंतु इनमें से करीब 300 अपने उपयोग की अवधि को पार कर चुके हैं और अब पानी के तेज़ बहाव को नहीं झेल सकते. इसी वर्ष कम से कम 180 तटबंध इसी साल पानी के जबरदस्त बहाव को नहीं रोक सके.

यहां से करीब 150 किलोमीटर दूर गोहपुर जिले में, प्रदीप मिली, रेखा के डर को जी चुके हैं. 34 वर्षीय प्रदीप अपने पिता, पत्नी और दो बच्चों के साथ बोरफलांग गांव में रहते हैं. उनका परिवार 2008 में बोरफलांग आने को विवश हो गया, जब वहां से 17 किलोमीटर दूर थे उनका पुश्तैनी गांव लोहितमुख, ब्रह्मपुत्र की एक बाढ़ में बह गया था.

प्रदीप अपनी आपबीती बताते हैं, "लोहितमुख में करीब हम 600 लोग थे. हममें से कुछ इस गांव में आ गए पर मुझे नहीं पता कि अधिकतर लोगों के साथ गांव बह जाने के बाद क्या हुआ. उनमें बहुत से तो ऐसे हैं जिनके साथ मैं बड़ा हुआ. हमारा गांव बिल्कुल ब्रह्मपुत्र के तट पर ही था. बाढ़ के मौसम में हम हमेशा चौकन्ने रहते थे क्योंकि हमें बताने वाला कोई नहीं था कि कब अचानक नदी उग्र हो जाए. हर साल वह हमारी थोड़ी सी जमीन ले जाती थी, लेकिन तब रातों-रात हमने सब कुछ खो दिया."

प्रदीप और उनका परिवार बोरफलांग में केवल अपने तन पर कपड़ों के साथ ही आए थे. गांव के कुछ परिवारों ने ही उन्हें कुछ महीनों के लिए सहारा दिया जब तक इधर उधर काम करके प्रदीप ने थोड़ी सी जमीन खरीदने लायक कमाई नहीं कर ली. परंतु बोरफलांग में रहने की अपनी अलग कीमत है.

प्रदीप कहते हैं, "यह गांव 6 महीने पानी के नीचे रहता है. उनमें से 3 महीने हमें अपना घर छोड़कर एक तंबू में पुश्ते के पास रहना पड़ता है. तब मैं अपनी जमीन पर भी काम नहीं कर सकता तो मैं अपने मुर्गी और बकरियां बेच देता हूं, छुटपुट काम करके गुज़ारा चल पाता है. मेरा घर बाढ़ की शुरुआत के 2 दिनों में ही डूब जाता है, इसलिए मुझे लगातार खास तौर पर रात को चौकन्ना रहना पड़ता है. मैं नदी पर भरोसा नहीं करता, कोई नहीं कह सकता कि वह फिर कब आकर सब कुछ अपने साथ बहा ले जाए."

नदी के साथ चलने वाली चिरंतन भिड़ंत ने प्रदीप को भावनात्मक रूप से काफी नुकसान पहुंचाया है. वे कहते हैं, "मैं इसे शब्दों में कैसे कहूं? मैं हमेशा चिंता में ही जीता हूं. मेरे पुश्तैनी गांव में अब रेत ही बची है, हर साल मेरे जानवर मर जाते हैं और मेरे खेत में उपज न के बराबर है. मुझे अपनी छाती पर एक बोझ सा महसूस होता है जिससे मैं छुटकारा नहीं पा रहा हूं. मुझे हर साल इस नुकसान को झेलना पड़ता है. पर इस बारे में बात करके क्या होगा? ऐसा तो है नहीं कि हमें सरकार से कोई मदद मिल जाएगी."

असम में प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोग, अपने घर खेत और आजीविका खोने पर राज्य से मुआवजे के हकदार हैं. उदाहरण के तौर पर, एक परिवार जिसने बाढ़ में अपना घर खो दिया वह राज्य की विपदा निधि से 95100 रुपए का हकदार है, और एक किसान को अपने खेत से गाद हटाने के लिए 12200 रुपए प्रति हेक्टेयर मिलने चाहिए. इसी तरह, 1 अप्रैल से 1 जुलाई के दौरान मछुआरों के लिए मंदी के समय- जिसे "लीन पीरियड" भी कहा जाता है जब मछलियों का प्रजनन का मौसम होता है और उन्हें काम करने की इजाज़त नहीं होती- मछुआरों को प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत 1500 रुपए प्रति माह मिलने चाहिए. मत्स्य विभाग के सचिव राकेश कुमार के अनुसार मछुआरों को इसके अलावा बाढ़ के महीनों में भी, आजीविका के नुकसान के कारण मुआवजा देने की एक योजना पर काम चल रहा है.

परंतु यथार्थ में केवल कुछ ही लोगों को मुआवजा मिल पाता है, क्योंकि उनकी अपीलें प्रशासनिक लालफीताशाही में ही उलझ कर रह जाती हैं.

प्रशासन की तरफ से सहायता न होने का मतलब है कि बोरफलांग में प्रदीप का जीवन अत्यधिक कठिन है, पर वो छोड़कर भी नहीं जा सकते, प्रदीप कहते हैं, "मैं भूमिहीन होने के बजाय यहां रहना पसंद करूंगा."

संभवत: प्रदीप एक हारा हुआ युद्ध लड़ रहे हैं. 2015 की ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार ब्रह्मपुत्र के द्वारा भूमि का कटान हर साल बढ़ता ही जा रहा है, रिपोर्ट कहती है कि "लगातार ब्रेडिंग और उसके साथ होने वाले कटान ने, नदी तल का क्षेत्रफल काफी ज्यादा बढ़ा दिया है. यह 1916 से 1928 के बीच लगभग 3870 किलोमीटर से 2006 में 6080 किलोमीटर अनुमानित है."

एक दूसरी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, "ब्रह्मपुत्र की कुछ जगहों पर चौड़ाई, तटीय कटान की वजह से 15 किलोमीटर तक बढ़ गई है." नदी में निरंतर 'ब्रेडिंग' हुई है और इस वजह से उसने अपना रास्ता बार-बार बदला है.

नदी तट के निरंतर कटान के निश्चय ही विकट प्राकृतिक और आर्थिक परिणाम हैं, परंतु विश्वनाथ घाट पुरोनी गांव में यह सांस्कृतिक संपदा को भी खतरे में डाल दे रहा है. विश्वनाथ जिले को प्रसिद्धि देने वाले कई मंदिर नदी के घाट पर ही बने हैं, ऐसे कुछ घर भी हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि वह समय निकट ही है जब बचा खुचा तक भी नदी काट ले जाएगी और यह सब इमारतें पानी में बह जाएंगी.

अधिकतर घर बाढ़ की सीमा से दूर ही बने हुए हैं लेकिन नदी इंच दर इंच पास आती जा रही है और हर साल उग्र होती जा रही है. 35 वर्षीय तीर्थो दास, जिन्होंने अपना पूरा जीवन गांव में बिताया है, कहते हैं, "बाढ़ का पानी हर साल लगातार बढ़ता ही जा रहा है. हम यह भी देख रहे हैं कि हमारे तट और नदी के बीच में एक टापू का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है. नदी चौड़ी होती जा रही है और उसमें आने वाली गाद बढ़ रही है जो उसे और उथला और कीचड़ से भरा बना रही है."

गांव वालों के लिए यह खतरे की घंटी है जिनमें से अधिकतर अपनी आजीविका के लिए मछली पकड़ने पर निर्भर हैं. यहां के करीब 80 प्रतिशत लोग नदी पर अपनी आजीविका और भोजन, दोनों के लिए निर्भर करते हैं.

तीर्थो दास ब्रह्मपुत्र में 17 साल से मछुआरे की तरह काम कर रहे हैं, उनके पिता और दादा भी उनसे पहले यही किया करते थे. यह नदी उनके जीवन यापन का एकमात्र जरिया है. बाढ़ के महीने में वह मछलियां पकड़ नहीं सकते और "लीन पीरियड" में उन्हें इसकी इजाजत नहीं है. इस लिंक पीरियड में आजीविका कोने पर, मछुआरे मुआवजे के हकदार हैं परंतु तीर्थो या उनके पिता को यह मुआवजा कभी नहीं मिला.

वे आगे बताते हैं: "कम से कम इस क्षेत्र में गहराई कम होने का मतलब है मछलियों के आकार और संख्या में साल दर साल गिरावट आई है. अब हमें केवल छोटी मछलियां ही मिलती हैं और रोज की पकड़ करीब 200 रुपए तक की होती है जबकि पहले यह करीब 600 रुपए हुआ करती थी. मछली अभी भी वही है पर अब वह आकार में छोटी होती हैं क्योंकि बड़ी मछलियों को गहरा पानी चाहिए होता है. अधिकतर मछलियां काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में चली जाती हैं. हालांकि उद्यान हमारे दूसरे ही तत्पर है लेकिन हमें वहां मछली पकड़ने की इजाजत नहीं है."

दोखिमपाथ कोईबोत्रो में भी वे मछुआरे जिनके जीवन और आजीविका, दोनों ही बढ़ती हुई नदी से खतरे में हैं, को भी सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है. दोखिमपथ कोईबोत्रो, नदी के मजूली टापू के किनारे पर बसा एक गांव है, यह टापू एक शताब्दी पहले 800 वर्ग किलोमीटर से घटकर अब आधे से भी कम रह गया है. जोरहाट के निमती घाट से मजूली जाने वाली नाव में ब्रह्मपुत्र के इस टापू का क्षरण, इसके तटों पर देखा जा सकता है.

दोखिमपाथ कोईबोत्रो में रहने वाले 48 वर्षीय दिगंतो दास, टापू और उसके रहने वाले लोगों को चरण की वजह से होने वाले नुकसान के साक्षी हैं. वे कहते हैं, "समय के साथ-साथ कटान की वजह से मजूली धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है. अगर कटान ऐसे ही चलता रहा, जो लग रहा है चलेगा भी, तो हम रहेंगे कहां? मजूली कोई 12 गांव नहीं, यहां पर सैकड़ों गांव हैं. हम सब कहां जाएंगे? जब बाढ़ हमारे घरों को बहाकर ले जाती है तो उन्हें दोबारा बनाने में हमें सरकार से कोई मदद नहीं मिलती. हम उन पर आंख मूंदकर कैसे भरोसा कर लें कि वह हमें भविष्य में, ठीक से पुनर्वासित करेंगे?"

दिगंतो के पड़ोसी, 52 वर्षीय फूकन दास जो खुद भी एक मछुआरे हैं, को हर साल अपना घर दोबारा से बनाने के लिए खर्च करना पड़ता है. हर बार यह एक विकट परेशानी है. खास तौर पर तब जब वह हर साल कुछ महीने मछली नहीं पकड़ सकते और जो मुआवजा उन्हें मिलना चाहिए वह कभी नहीं मिलता.

फूकन बताते हैं, "हमारे घर केवल लकड़ी बांस और मिट्टी के बने होते हैं और हर साल जब बाढ़ आती है तो बह जाते हैं. और हर साल एक घर को दोबारा से बनाने में 50-60 हजार का खर्चा होता है."

प्रलाप पेगू, जो बोरफलांग में किसान हैं को भी आज तक मुआवजा नहीं मिला. वे कहते हैं, "हर साल मेरा बैंक का खाता नंबर लेने के बावजूद भी सरकार ने मुझे कभी मुआवजा नहीं दिया. सहायता सामग्री भी हम तक नहीं पहुंच पाती. मैंने शहर में रहकर नौकरी करने की कोशिश की क्योंकि वहां पैसा बेहतर मिलता था, पर उन 6 महीने जब हमारा गांव पानी में डूब जाता है मुझे अपने परिवार, जानवरों और घर की देखभाल के लिए वापस आना पड़ा."

प्रलाप कहते हैं कि अगर सरकार गांव को एक सिंचाई व्यवस्था बनाने में मदद कर दे तो उन सबके जीवन में काफी आसानी हो जाएगी. तब वह अपनी जमीन पर सर्दियों में काम कर पाएंगे जब वह पानी में डूबी नहीं होती. यह और बाढ़ के मौसम में पीने के पानी की व्यवस्था जब गांव के कुएं और बोरवेल डूब जाते हैं, उनकी "आवश्यक जरूरतों" को पूरा कर देगी.

2005 में, दिगंतो दास ने अपने पास के गांव को, जो करीब दो हजार लोगों का घर था, पूरी तरह से बह जाते हुए देखा और उन्हें डर है कि दोखिमपाथ कोईबोत्रो कहीं अगला बह जाने वाला गांव न हो. दिगंतो बांस के मचानों पर उठे हुए कच्चे घरों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "वे लोग जिनके घर बह गए थे उन्होंने उठी हुई सड़कों पर चांग बना लिए. जब बाढ़ आती है, वे अपने पशुधन और सामान को लेकर उस पर चले जाते हैं और उसके उतरने का इंतजार करते हैं. इन लोगों के पुनर्वास के बारे में किसी ने चूं तक नहीं की है. मजूली पर बसे करीब 70 गांव इस क्षरण की वजह से तबाह हो गए हैं और अधिकतर गांव वाले या तो टापू को छोड़कर जा नहीं सकते या जाना नहीं चाहते. यानी जब टापू सिकुड़ रहा है, तब जनसंख्या या तो उतनी ही है या बढ़ रही है."

क्या उन्होंने उस टापू को, जो उनकी आंखों के सामने सिकुड़ रहा है, छोड़ने के बारे में सोचा है? विघ्न हंसते हुए उत्तर देते हैं, "यह मेरी जन्मभूमि है. मेरे सारे पुरखे भी यहीं पैदा हुए, और अगर मैं छोड़कर जाना भी चाहता तो ऐसा कोई रास्ता नहीं कि मैं ऐसा कर सकूं. मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं जोरहट में जाऊं और थोड़ी सी जमीन खरीद लूं. मुझे अपनी सारी मुसीबतों का सामना करते हुए यहीं पर जीवित रहना होगा. यह मेरी भूमि है और मैं यहीं मरूंगा."

***

फोटो - सुप्रिती डेविड

पांच भागों में प्रकाशित होने वाली असम बाढ़ और बंगाल के अमफन चक्रवात के कारण होने वाले विनाशकारी परिणाम सीरीज का यह पहला पार्ट है.

यह स्टोरी हमारे एनएल सेना प्रोजेक्ट का हिस्सा जिसमें 43 पाठकों ने सहयोग किया है. यह आदित्य देउस्कर, देशप्रिया देवेश, जॉन अब्राहम, अदिति प्रभा, रोहित उन्नीमाधवन, अभिषेक दैविल, और अन्य एनएल सेना के सदस्यों के लिए संभव बनाया गया है. हमारे अगले एनएल सेना प्रोजेक्ट 'लव जिहाद': मिथ वर्सेस रियलिटी में सहयोग दे और गर्व से कहें मेरे ख़र्च पर आजाद हैं ख़बरें.

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हर साल, घड़ी की सुईयों की तरह ही निश्चित समय पर, बढ़ती हुई ब्रह्मपुत्र से आई असम बाढ़ की तस्वीरें भारतीय मीडिया पर छा जाती हैं. हर साल, इस आपदा के बाद उठाए गए कदम केवल जान और माल को हुए नुकसान और खत्म हुई फसल और जीव-जंतुओं की गणना भर बन कर रह जाते हैं. कभी कभार प्रकृति का विनाश, आपदा का कारण और परिणाम बनकर भी बातचीत का हिस्सा बन जाता है. परंतु आम लोग जो इस आपदा को झेलते हैं उनकी बात शायद ही कभी होती है, होती भी है तो जल्द ही खबरों के चक्र में भुला दी जाती है. फिर नया साल आता है और फिर उसी कथानक का पटाक्षेप शुरू हो जाता है.

भारत में बाकी जगह भी कमोबेश ऐसा ही है. किसी आपदा से उपजी मानवीय वेदना के आर्थिक और प्राकृतिक परिस्थितियों से जुड़े कारणों को दोषारोपण करने के बाद विवाद और संख्यात्मक विश्लेषण पीछे छोड़ देते हैं.

इसी को सुधारने के प्रयास में न्यूजलॉन्ड्री ने साल 2020 की दो सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं- ब्रह्मपुत्र बाढ़ और अमफन चक्रवात- जिनमें कम से कम 221 जानें गईं, से आम लोगों के जीवन में आई तबाही को जानने के लिए असम और बंगाल की यात्रा की.

असम में जहां बाढ़ साल दर साल उन्हें हाशिए पर रहने वाले लोगों को तबाह कर देती है, हमने ब्रह्मपुत्र के तट पर करीब 1300 किलोमीटर कवर करते हुए, छह बाढ़ ग्रस्त जिलों और विश्व के सबसे बड़े नदी के टापू मजूली का दौरा किया. बंगाल में हमने सुंदरबन क्षेत्र में, अमफन से तबाह हुए मैंग्रोव डेल्टा अर्थात नदी के पाट पर बने हुए उष्णकटिबंधीय वृक्षों के झुरमुट पर ध्यान दिया.

उत्तर पूर्व के राज्य असम में आपदा की सबसे बुरी मार झेलने वाले लोगों की सबसे बड़ी समस्या जमीन का क्षरण और उसके कारण भूमिहीन बन जाना है.

असम ने 1950 से नदी के कारण होने वाले भूमि के क्षरण में 4270 वर्ग किलोमीटर ज़मीन और 2500 गांव खोए हैं. यह क्षेत्रफल में गोवा राज्य से ज्यादा भूमि है. राज्य के पर्यावरण विभाग की पांच वर्ष पुरानी ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार, खोई हुई भूमि में से कम से कम 3800 वर्ग किलोमीटर "अत्यधिक उपजाऊ खेती की जमीन" थी और रिपोर्ट ब्रह्मपुत्र के बहने के रास्ते में निरंतर बदलाव को आपदाओं का मुख्य कारण मानती है.

रिपोर्ट यह भी इंगित करती है कि "बाढ़ और भूमि के कटान के साथ जुड़ा नुकसान भी बढ़ता ही जा रहा है क्योंकि इनके कारण विस्थापन भी हो रहा है. जिससे जमीन के ऊपर होने वाले टकराव भी बढ़ गए हैं और वे जनता के आर्थिक विकास के लिए खतरा बन सकते हैं.

लेकिन इसी वर्ष इस कटान को प्राकृतिक आपदा मानने के लिए जोर दिया जा रहा है. जिससे कि इससे प्रभावित जनसंख्या को राज्य से दी जाने वाली मुआवजे की रकम मिल सके. NENow की एक रिपोर्ट कहती है, "आपदा नुकसान मरम्मत योजना के अंतर्गत निर्धारित की गई राशि भूमि कटान के कारण प्रभावित हुए लोगों तक नहीं पहुंचती. यहां तक कि राज्य सरकार के पास, विस्थापित हुए लोगों का कोई लेखा-जोखा नहीं है, खास तौर पर निचले असम क्षेत्र में."

कटान ने कैसे आम लोगों के जीवन और जीवन यापन को तहस-नहस कर दिया है. इसको देखने के लिए अरुणाचल प्रदेश सीमा के निकट, धेमाजी जिले के करीब 90 परिवारों वाले हेसुली पठार गांव को देखें.

अरुणाचल हाईवे से 25 मिनट की दूरी पर बसे इस छोटे से गांव को 6 साल से भयानक बाढ़ तबाह कर दे रही है. तबाही हर तरफ क्षतिग्रस्त मकानों और रेतीले हो चुकी बंजर खेती की जमीन से दिखाई देती है. लोग जहां अपनी आजीविका के लिए प्राथमिक तौर पर खेती पर निर्भर हैं वहां खेतिहर भूमि का नुकसान, एक बहुत बड़ा झटका है.

34 वर्षीय रेखा गोगोई जो स्थानीय पंचायत की सदस्य भी हैं, खेतों के बीच से जा रहे एक धारा की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं, "आप यह नदी देख रहे हैं? यहीं मेरी ज़मीन हुआ करती थी." यह धारा, ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी जियाढाल नदी से, कुछ ही समय पहले निकली है. नदी के बहाव को अलग-अलग धाराओं में बंट जाने को नदी की 'ब्रेडिंग' कहा जाता है.

रेखा बताती हैं, "मेरे खेत का नामोनिशान तक नहीं बचा है. जियाढाल नदी की यह धार सब कुछ बहा कर ले गई. इसी साल यह हमारे गांव से होते हुए बह गई, मैं जब भी उधर देखती हूं तो अवसाद से भर जाती हूं. हमारे पास नदी के उस पार बहुत थोड़ी सी जमीन बची है पर उसमें जगह-जगह रेत आ गई हैं जिसमें कुछ नहीं उगता. यह सब हुए महीनों बीत गए हैं पर हम अभी भी इस से समझौता नहीं कर पाए हैं."

नदी की यह नई धारा केवल रेखा की खेती जमीन ही नहीं, बल्कि उसने उसके परिवार का भविष्य भी अंधकारमय कर दिया है. रेखा का कहना है, "हम इस ज़मीन पर पूरी तरह से निर्भर थे. हम अपने खाने के लिए भी उगाते और उसे बाजार में भी बेच देते. पर अब वह सब चला गया है और मैं नहीं जानती कि हम क्या करेंगे. मेरी एक 9 साल और एक 12 साल की बेटियां हैं, उन्हें पढ़ाना और बड़ा करना है. हमें उनके लिए कोई हल तो निकालना ही पड़ेगा."

नदी के दूसरी तरफ धान के खेत अभी पूरी तरह से रेतीले नहीं हुए तो अभी उनमें खेती की जा सकती है, लेकिन नदी के इस पाट पर खेती लायक जमीन बाढ़ के द्वारा बड़ी मात्रा में लाए रेत और गाद की वजह से कम से कम दो साल तो बंजर ही रहेगी.

एक समय था जब बाढ़ का आना अपने साथ कुछ अच्छा भी लेकर आता था. बाढ़ अपने पीछे उर्वरक गाद छोड़ जाती थी जिससे मिट्टी फिर से उपजाऊ हो जाती थी. परंतु अब आने वाली गाद अधिकतर रेत ही होती है जिसका एक बहुत बड़ा कारण पर्यावरण परिवर्तन है.

रेखा कहती हैं, "हमारे यहां पेड़ और खास तौर पर बांस के पेड़, सूखने शुरू हो गए हैं. हम उपयोग में आने वाला बास गांव में ही उगा लेते थे, पर अब हमें वह बाहर से खरीदना पड़ रहा है. हमारे पेड़ और फसल इस रेतीली भूमि से मेल नहीं खाते."

हेसुली गांव के लोगों की यह विकट परिस्थिति कोई प्राकृतिक दुर्घटना नहीं है. कम से कम 4 सालों से यह लोग प्रशासन से गुहार लगा रहे हैं कि जियाढाल नदी पर ऊपर बने पुश्ते या तटबंध की मरम्मत की जाए, पर कुछ हुआ नहीं. इस वर्ष नदी तटबंध को तोड़ते हुए बह गई और गांव को डुबोते हुए उसने एक नई धारा को जन्म दे दिया.

रेखा बताती हैं, "अगर तटबंध की मरम्मत कर दी जाए, तो वह इस क्षेत्र के 40 गांवों को हर साल बाढ़ग्रस्त होने से काफी हद तक बचा सकता है. इसके साथ ही साथ यह नहीं धारा भी मोड़ दी जाएगी तो मिट्टी भी कुछ वर्षों में दोबारा से उपजाऊ हो जाएगी, पर सरकार की तरफ से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है. हम इस डर में जीते हैं कि किसी भी दिन हमारा पूरा गांव बह सकता है."

असम में करीब ऐसे 423 तटबंधों का जाल पिछले छह दशकों में निर्मित किया गया है परंतु इनमें से करीब 300 अपने उपयोग की अवधि को पार कर चुके हैं और अब पानी के तेज़ बहाव को नहीं झेल सकते. इसी वर्ष कम से कम 180 तटबंध इसी साल पानी के जबरदस्त बहाव को नहीं रोक सके.

यहां से करीब 150 किलोमीटर दूर गोहपुर जिले में, प्रदीप मिली, रेखा के डर को जी चुके हैं. 34 वर्षीय प्रदीप अपने पिता, पत्नी और दो बच्चों के साथ बोरफलांग गांव में रहते हैं. उनका परिवार 2008 में बोरफलांग आने को विवश हो गया, जब वहां से 17 किलोमीटर दूर थे उनका पुश्तैनी गांव लोहितमुख, ब्रह्मपुत्र की एक बाढ़ में बह गया था.

प्रदीप अपनी आपबीती बताते हैं, "लोहितमुख में करीब हम 600 लोग थे. हममें से कुछ इस गांव में आ गए पर मुझे नहीं पता कि अधिकतर लोगों के साथ गांव बह जाने के बाद क्या हुआ. उनमें बहुत से तो ऐसे हैं जिनके साथ मैं बड़ा हुआ. हमारा गांव बिल्कुल ब्रह्मपुत्र के तट पर ही था. बाढ़ के मौसम में हम हमेशा चौकन्ने रहते थे क्योंकि हमें बताने वाला कोई नहीं था कि कब अचानक नदी उग्र हो जाए. हर साल वह हमारी थोड़ी सी जमीन ले जाती थी, लेकिन तब रातों-रात हमने सब कुछ खो दिया."

प्रदीप और उनका परिवार बोरफलांग में केवल अपने तन पर कपड़ों के साथ ही आए थे. गांव के कुछ परिवारों ने ही उन्हें कुछ महीनों के लिए सहारा दिया जब तक इधर उधर काम करके प्रदीप ने थोड़ी सी जमीन खरीदने लायक कमाई नहीं कर ली. परंतु बोरफलांग में रहने की अपनी अलग कीमत है.

प्रदीप कहते हैं, "यह गांव 6 महीने पानी के नीचे रहता है. उनमें से 3 महीने हमें अपना घर छोड़कर एक तंबू में पुश्ते के पास रहना पड़ता है. तब मैं अपनी जमीन पर भी काम नहीं कर सकता तो मैं अपने मुर्गी और बकरियां बेच देता हूं, छुटपुट काम करके गुज़ारा चल पाता है. मेरा घर बाढ़ की शुरुआत के 2 दिनों में ही डूब जाता है, इसलिए मुझे लगातार खास तौर पर रात को चौकन्ना रहना पड़ता है. मैं नदी पर भरोसा नहीं करता, कोई नहीं कह सकता कि वह फिर कब आकर सब कुछ अपने साथ बहा ले जाए."

नदी के साथ चलने वाली चिरंतन भिड़ंत ने प्रदीप को भावनात्मक रूप से काफी नुकसान पहुंचाया है. वे कहते हैं, "मैं इसे शब्दों में कैसे कहूं? मैं हमेशा चिंता में ही जीता हूं. मेरे पुश्तैनी गांव में अब रेत ही बची है, हर साल मेरे जानवर मर जाते हैं और मेरे खेत में उपज न के बराबर है. मुझे अपनी छाती पर एक बोझ सा महसूस होता है जिससे मैं छुटकारा नहीं पा रहा हूं. मुझे हर साल इस नुकसान को झेलना पड़ता है. पर इस बारे में बात करके क्या होगा? ऐसा तो है नहीं कि हमें सरकार से कोई मदद मिल जाएगी."

असम में प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोग, अपने घर खेत और आजीविका खोने पर राज्य से मुआवजे के हकदार हैं. उदाहरण के तौर पर, एक परिवार जिसने बाढ़ में अपना घर खो दिया वह राज्य की विपदा निधि से 95100 रुपए का हकदार है, और एक किसान को अपने खेत से गाद हटाने के लिए 12200 रुपए प्रति हेक्टेयर मिलने चाहिए. इसी तरह, 1 अप्रैल से 1 जुलाई के दौरान मछुआरों के लिए मंदी के समय- जिसे "लीन पीरियड" भी कहा जाता है जब मछलियों का प्रजनन का मौसम होता है और उन्हें काम करने की इजाज़त नहीं होती- मछुआरों को प्रधान मंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत 1500 रुपए प्रति माह मिलने चाहिए. मत्स्य विभाग के सचिव राकेश कुमार के अनुसार मछुआरों को इसके अलावा बाढ़ के महीनों में भी, आजीविका के नुकसान के कारण मुआवजा देने की एक योजना पर काम चल रहा है.

परंतु यथार्थ में केवल कुछ ही लोगों को मुआवजा मिल पाता है, क्योंकि उनकी अपीलें प्रशासनिक लालफीताशाही में ही उलझ कर रह जाती हैं.

प्रशासन की तरफ से सहायता न होने का मतलब है कि बोरफलांग में प्रदीप का जीवन अत्यधिक कठिन है, पर वो छोड़कर भी नहीं जा सकते, प्रदीप कहते हैं, "मैं भूमिहीन होने के बजाय यहां रहना पसंद करूंगा."

संभवत: प्रदीप एक हारा हुआ युद्ध लड़ रहे हैं. 2015 की ड्राफ्ट रिपोर्ट के अनुसार ब्रह्मपुत्र के द्वारा भूमि का कटान हर साल बढ़ता ही जा रहा है, रिपोर्ट कहती है कि "लगातार ब्रेडिंग और उसके साथ होने वाले कटान ने, नदी तल का क्षेत्रफल काफी ज्यादा बढ़ा दिया है. यह 1916 से 1928 के बीच लगभग 3870 किलोमीटर से 2006 में 6080 किलोमीटर अनुमानित है."

एक दूसरी सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, "ब्रह्मपुत्र की कुछ जगहों पर चौड़ाई, तटीय कटान की वजह से 15 किलोमीटर तक बढ़ गई है." नदी में निरंतर 'ब्रेडिंग' हुई है और इस वजह से उसने अपना रास्ता बार-बार बदला है.

नदी तट के निरंतर कटान के निश्चय ही विकट प्राकृतिक और आर्थिक परिणाम हैं, परंतु विश्वनाथ घाट पुरोनी गांव में यह सांस्कृतिक संपदा को भी खतरे में डाल दे रहा है. विश्वनाथ जिले को प्रसिद्धि देने वाले कई मंदिर नदी के घाट पर ही बने हैं, ऐसे कुछ घर भी हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि वह समय निकट ही है जब बचा खुचा तक भी नदी काट ले जाएगी और यह सब इमारतें पानी में बह जाएंगी.

अधिकतर घर बाढ़ की सीमा से दूर ही बने हुए हैं लेकिन नदी इंच दर इंच पास आती जा रही है और हर साल उग्र होती जा रही है. 35 वर्षीय तीर्थो दास, जिन्होंने अपना पूरा जीवन गांव में बिताया है, कहते हैं, "बाढ़ का पानी हर साल लगातार बढ़ता ही जा रहा है. हम यह भी देख रहे हैं कि हमारे तट और नदी के बीच में एक टापू का धीरे-धीरे क्षरण हो रहा है. नदी चौड़ी होती जा रही है और उसमें आने वाली गाद बढ़ रही है जो उसे और उथला और कीचड़ से भरा बना रही है."

गांव वालों के लिए यह खतरे की घंटी है जिनमें से अधिकतर अपनी आजीविका के लिए मछली पकड़ने पर निर्भर हैं. यहां के करीब 80 प्रतिशत लोग नदी पर अपनी आजीविका और भोजन, दोनों के लिए निर्भर करते हैं.

तीर्थो दास ब्रह्मपुत्र में 17 साल से मछुआरे की तरह काम कर रहे हैं, उनके पिता और दादा भी उनसे पहले यही किया करते थे. यह नदी उनके जीवन यापन का एकमात्र जरिया है. बाढ़ के महीने में वह मछलियां पकड़ नहीं सकते और "लीन पीरियड" में उन्हें इसकी इजाजत नहीं है. इस लिंक पीरियड में आजीविका कोने पर, मछुआरे मुआवजे के हकदार हैं परंतु तीर्थो या उनके पिता को यह मुआवजा कभी नहीं मिला.

वे आगे बताते हैं: "कम से कम इस क्षेत्र में गहराई कम होने का मतलब है मछलियों के आकार और संख्या में साल दर साल गिरावट आई है. अब हमें केवल छोटी मछलियां ही मिलती हैं और रोज की पकड़ करीब 200 रुपए तक की होती है जबकि पहले यह करीब 600 रुपए हुआ करती थी. मछली अभी भी वही है पर अब वह आकार में छोटी होती हैं क्योंकि बड़ी मछलियों को गहरा पानी चाहिए होता है. अधिकतर मछलियां काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में चली जाती हैं. हालांकि उद्यान हमारे दूसरे ही तत्पर है लेकिन हमें वहां मछली पकड़ने की इजाजत नहीं है."

दोखिमपाथ कोईबोत्रो में भी वे मछुआरे जिनके जीवन और आजीविका, दोनों ही बढ़ती हुई नदी से खतरे में हैं, को भी सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिली है. दोखिमपथ कोईबोत्रो, नदी के मजूली टापू के किनारे पर बसा एक गांव है, यह टापू एक शताब्दी पहले 800 वर्ग किलोमीटर से घटकर अब आधे से भी कम रह गया है. जोरहाट के निमती घाट से मजूली जाने वाली नाव में ब्रह्मपुत्र के इस टापू का क्षरण, इसके तटों पर देखा जा सकता है.

दोखिमपाथ कोईबोत्रो में रहने वाले 48 वर्षीय दिगंतो दास, टापू और उसके रहने वाले लोगों को चरण की वजह से होने वाले नुकसान के साक्षी हैं. वे कहते हैं, "समय के साथ-साथ कटान की वजह से मजूली धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है. अगर कटान ऐसे ही चलता रहा, जो लग रहा है चलेगा भी, तो हम रहेंगे कहां? मजूली कोई 12 गांव नहीं, यहां पर सैकड़ों गांव हैं. हम सब कहां जाएंगे? जब बाढ़ हमारे घरों को बहाकर ले जाती है तो उन्हें दोबारा बनाने में हमें सरकार से कोई मदद नहीं मिलती. हम उन पर आंख मूंदकर कैसे भरोसा कर लें कि वह हमें भविष्य में, ठीक से पुनर्वासित करेंगे?"

दिगंतो के पड़ोसी, 52 वर्षीय फूकन दास जो खुद भी एक मछुआरे हैं, को हर साल अपना घर दोबारा से बनाने के लिए खर्च करना पड़ता है. हर बार यह एक विकट परेशानी है. खास तौर पर तब जब वह हर साल कुछ महीने मछली नहीं पकड़ सकते और जो मुआवजा उन्हें मिलना चाहिए वह कभी नहीं मिलता.

फूकन बताते हैं, "हमारे घर केवल लकड़ी बांस और मिट्टी के बने होते हैं और हर साल जब बाढ़ आती है तो बह जाते हैं. और हर साल एक घर को दोबारा से बनाने में 50-60 हजार का खर्चा होता है."

प्रलाप पेगू, जो बोरफलांग में किसान हैं को भी आज तक मुआवजा नहीं मिला. वे कहते हैं, "हर साल मेरा बैंक का खाता नंबर लेने के बावजूद भी सरकार ने मुझे कभी मुआवजा नहीं दिया. सहायता सामग्री भी हम तक नहीं पहुंच पाती. मैंने शहर में रहकर नौकरी करने की कोशिश की क्योंकि वहां पैसा बेहतर मिलता था, पर उन 6 महीने जब हमारा गांव पानी में डूब जाता है मुझे अपने परिवार, जानवरों और घर की देखभाल के लिए वापस आना पड़ा."

प्रलाप कहते हैं कि अगर सरकार गांव को एक सिंचाई व्यवस्था बनाने में मदद कर दे तो उन सबके जीवन में काफी आसानी हो जाएगी. तब वह अपनी जमीन पर सर्दियों में काम कर पाएंगे जब वह पानी में डूबी नहीं होती. यह और बाढ़ के मौसम में पीने के पानी की व्यवस्था जब गांव के कुएं और बोरवेल डूब जाते हैं, उनकी "आवश्यक जरूरतों" को पूरा कर देगी.

2005 में, दिगंतो दास ने अपने पास के गांव को, जो करीब दो हजार लोगों का घर था, पूरी तरह से बह जाते हुए देखा और उन्हें डर है कि दोखिमपाथ कोईबोत्रो कहीं अगला बह जाने वाला गांव न हो. दिगंतो बांस के मचानों पर उठे हुए कच्चे घरों की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, "वे लोग जिनके घर बह गए थे उन्होंने उठी हुई सड़कों पर चांग बना लिए. जब बाढ़ आती है, वे अपने पशुधन और सामान को लेकर उस पर चले जाते हैं और उसके उतरने का इंतजार करते हैं. इन लोगों के पुनर्वास के बारे में किसी ने चूं तक नहीं की है. मजूली पर बसे करीब 70 गांव इस क्षरण की वजह से तबाह हो गए हैं और अधिकतर गांव वाले या तो टापू को छोड़कर जा नहीं सकते या जाना नहीं चाहते. यानी जब टापू सिकुड़ रहा है, तब जनसंख्या या तो उतनी ही है या बढ़ रही है."

क्या उन्होंने उस टापू को, जो उनकी आंखों के सामने सिकुड़ रहा है, छोड़ने के बारे में सोचा है? विघ्न हंसते हुए उत्तर देते हैं, "यह मेरी जन्मभूमि है. मेरे सारे पुरखे भी यहीं पैदा हुए, और अगर मैं छोड़कर जाना भी चाहता तो ऐसा कोई रास्ता नहीं कि मैं ऐसा कर सकूं. मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं जोरहट में जाऊं और थोड़ी सी जमीन खरीद लूं. मुझे अपनी सारी मुसीबतों का सामना करते हुए यहीं पर जीवित रहना होगा. यह मेरी भूमि है और मैं यहीं मरूंगा."

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फोटो - सुप्रिती डेविड

पांच भागों में प्रकाशित होने वाली असम बाढ़ और बंगाल के अमफन चक्रवात के कारण होने वाले विनाशकारी परिणाम सीरीज का यह पहला पार्ट है.

यह स्टोरी हमारे एनएल सेना प्रोजेक्ट का हिस्सा जिसमें 43 पाठकों ने सहयोग किया है. यह आदित्य देउस्कर, देशप्रिया देवेश, जॉन अब्राहम, अदिति प्रभा, रोहित उन्नीमाधवन, अभिषेक दैविल, और अन्य एनएल सेना के सदस्यों के लिए संभव बनाया गया है. हमारे अगले एनएल सेना प्रोजेक्ट 'लव जिहाद': मिथ वर्सेस रियलिटी में सहयोग दे और गर्व से कहें मेरे ख़र्च पर आजाद हैं ख़बरें.

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