ढाल में पड़ती दरार: कैसे सुंदरबन के जंगल मर रहे हैं और बंगाल के लिए चक्रवातों का खतरा बढ़ा रहे हैं

इस तटीय क्षेत्र के मैंग्रोव वन ऐतिहासिक रूप से राज्य को चक्रवातों से बचाते रहे हैं. परंतु निर्वनीकरण और पर्यावरण परिवर्तन के असर दिखने लगे हैं.

ढाल में पड़ती दरार: कैसे सुंदरबन के जंगल मर रहे हैं और बंगाल के लिए चक्रवातों का खतरा बढ़ा रहे हैं
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बढ़ता तापमान और खारापन

सुंदरबन के रक्षा कवच की तबाही और चक्रवातों की भरमार का एक और बहुत बड़ा कारण है, पर्यावरण परिवर्तन.

मैंग्रोव के वृक्ष 10 से 19 डिग्री सेल्सियस के पानी में उगते हैं. अगर तापमान वृक्षों के अनुकूल इस सीमा से थोड़ा भी इधर उधर होता है, तो वृक्ष मरने लगते हैं.

2012 की बंगाल पर्यावरण कार्यवाहक योजना के अनुसार पिछले 30 सालों में सुंदरबन में औसत तापमान प्रति दशक 0.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है, जो कि वैश्विक औसत 0.06 डिग्री से लगभग 8 गुना ज्यादा है.

इस अध्ययन के अनुसार इस समस्या को और भी बढ़ाने वाली बात यह है कि सुंदरबन में समुद्र का स्तर 1.2 इंच प्रतिवर्ष बढ़ा है, इसके अनुपात में जल स्तर बढ़ने का वैश्विक औसत 0.14 इंच है.

कोलकाता विश्वविद्यालय में समुद्र विज्ञान के प्रोफेसर एसके मुखर्जी कहते हैं, "यह मुख्यतः पानी के pH स्तर के गिरने की वजह से होता है, जिसका कारण पानी में ऑक्सीजन का कम होता स्तर है. ऐसा होने का कारण भी कम होते मैंग्रोव वन हैं क्योंकि उनमें हवा और पानी दोनों ही से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड खींच लेने की क्षमता होती है."

वे यह भी कहते हैं, "समुद्र का बढ़ता स्तर और उसके साथ तेजी से बढ़ता तापमान, दुनिया के इस हिस्से में चक्रवातों को बढ़ाता है."

बढ़े हुए तापमान और समुद्र से निकटता दोनों ही में सुंदरबन के पानी में खारेपन को बढ़ाने में योगदान दिया है. जब भी चक्रवात आता है यह खारापन बढ़ जाता है क्योंकि चक्रवात के ज़रिए समुद्र का पानी नदियों और उनके टापुओं में पहुंच जाता है. इससे मिट्टी में खारे तत्वों की मात्रा बढ़ जाती है जिसके परिणामस्वरूप मैनग्रोव के वृक्षों की जड़ें कमजोर और उनकी वृद्धि को हानि पहुंचती है.

पर्यावरणविद जयंत सेन कहते हैं किस का एक इलाज और ज्यादा बारिश होना हो सकता है. वह कहते हैं, "और ज्यादा तूफानों के कारण समुद्र से आने वाले खारे जल की बढ़ोतरी को बारिश का पानी सुंदरबन की नदियों में बराबर कर सकता है." लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है. सुंदरबन में औसतन 1920 मिलीमीटर सालाना वर्षा होती है, और यह औसत बढ़ नहीं रहा बल्कि गिर रहा है.

तटबंधों का प्रश्न

इसी क्षेत्र में बाढ़ के खतरे को देखते हुए अंग्रेजों ने 100 साल से थोड़ा अधिक समय पहले मिट्टी के तटबंध बनाए थे. यह 3122 किलोमीटर के तटबंधों के घेराव की देखरेख राज्य के सिंचाई और जल विभाग करते हैं.

चोटो मोलखली का तबाह किया हुआ तटबंध

चोटो मोलखली का तबाह किया हुआ तटबंध

चक्रवात ऐला के नष्ट करने से पहले अरुण सरकार का घर जहां खड़ा था

चक्रवात ऐला के नष्ट करने से पहले अरुण सरकार का घर जहां खड़ा था

2009 में ऐला चक्रवात ने तटबंध के 778 किलोमीटर को तबाह कर दिया था खाना की स्थानीय नागरिकों की गणना में यह नुकसान और ज्यादा था. इसके पश्चात, अंग्रेजों के बाद पहली बार बंगाल सरकार में इनके पुनर्निर्माण की योजना राज्य के सिंचाई विभाग की देखरेख में शुरू की. इस योजना में अंग्रेजों के जमाने के मिट्टी के तटबंधों को 5032 करोड़ रुपए की लागत से ईंट, गारे और पॉलिप्रोपिलीन की चादरों से पुनर्निर्मित करने की थी.

यह बात 2009 की है. आज 10 साल बाद यह योजना पूरी नहीं हुई है. अपनी पहचान छुपाने की शर्त पर सिंचाई विभाग के एक कर्मचारी बताते हैं, "केवल 20 प्रतिशत राशि का इस्तेमाल हुआ है, और प्रायोजित 1000 किलोमीटर में से केवल 100 किलोमीटर ही पुनर्निर्माण हुआ है." कर्मचारी ने इससे अधिक सूचना देने से इंकार कर दिया.

जहां पर पुनर्निर्माण हुआ भी है, वहां भी वह हर जगह सफल नहीं हुआ. दयापुर टापू में ग्रामीण कहते हैं कि "जब भी चक्रवात आता है, तो नए तटबंध में से सीमेंट के टुकड़े उखड़ कर बह जाते हैं."

अरुण सरकार बताते हैं, "कभी-कभी हम गांव के लोग तटबंध को सीमेंट के बोरों से दोबारा बनाते हैं. कभी-कभी सरकारी लोग भी आकर हमारी मदद करते हैं पर निर्माण की गुणवत्ता जैसी होनी चाहिए वैसी नहीं है, आप देख ही रहे हैं." यह कहते हुए उन्होंने तटबंध के एक हिस्से की तरफ इशारा किया जहां से अमफन चक्रवात के बाद सीमेंट निकल गया था.

छोटो मोल्लाखली टापू पर ग्रामीण कहते हैं कि सरकार ने कभी किसी को तटबंध के पुनर्निर्माण के लिए भेजा ही नहीं. मौशुमि मोंडल अंग्रेजो के द्वारा बनाए गए और जर्जर हो चुके तटबंध की तरफ इशारा करते हुए कहती हैं, "इस तटबंध को मैंने बचपन से देखा है. चक्रवात और थोड़ी बहुत बारिश भी इसे जैसे पिघलाने लगती है. उसके बाद हमें कई-कई दिन तक घुटनों तक कीचड़ में चलना पड़ता है. इससे हमें काफी परेशानी होती है."

चक्रवात के तबाही मचाने के बाद गांव वाले इकट्ठा होकर तटबंधों को दोबारा बनाते हैं. पर उनकी क्षमता ज्यादा कुछ करने की नहीं है जिसके परिणाम स्वरूप वह बहुत नाज़ुक होता है. जब अगला चक्रवात आता है तो तटबंध टूट जाता है और समुद्र का पानी खेतों और गांव में बह आता है और फसलें भी तबाह हो जाती हैं.

अरुण सरकार अपने कड़वे अनुभव से जानते हैं की असल में सुंदरबन कितने बड़े खतरे में है. 11 साल पहले ऐला चक्रवात में उन्होंने अपना घर खो दिया था.

दयापुर टापू के तट की तरफ, वह नदी के एक भाग की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, "हमारा यहां घर हुआ करता था. उस तरफ खेत था और वहां दूसरी तरफ मैं बचपन में खेला करता था."

घर और खेत अब दोनों ही नहीं हैं, दोनों को चढ़ते हुए पानी ने निगल लिया. टापू पर बाढ़ आ गई, 332 लोग मारे गए और 40 हजार से ज्यादा घर तबाह हो गए, इनमें से एक घर अरुण सरकार का था.

तब से अरुण ने अपना घर दोबारा से बना लिया है. परंतु उनके और हजारों और लोग जो यहां रहते हैं, केवल थोड़े ही समय की बात है कि अगला चक्रवात आ जाएगा.

कुछ नाम पहचान छुपाने के लिए बदल दिए गए हैं.

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पांच भागों में प्रकाशित होने वाली असम बाढ़ और बंगाल के अमफन चक्रवात के कारण होने वाले विनाशकारी परिणाम सीरीज का यह तीसरा पार्ट है. पहला पार्ट और दूसरा पार्ट यहां पढ़ें.

यह स्टोरी हमारे एनएल सेना प्रोजेक्ट का हिस्सा जिसमें 43 पाठकों ने सहयोग किया है. यह आदित्य देउस्कर, देशप्रिया देवेश, जॉन अब्राहम, अदिति प्रभा, रोहित उन्नीमाधवन, अभिषेक दैविल, और अन्य एनएल सेना के सदस्यों के लिए संभव बनाया गया है. हमारे अगले एनएल सेना प्रोजेक्ट 'लव जिहाद': मिथ वर्सेस रियलिटी में सहयोग दे और गर्व से कहें मेरे ख़र्च पर आजाद हैं ख़बरें.

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